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न्यायिक फैसलों में संशोधन संभव

Vinit Narain

Updated Fri, 25 May 2012 12:00 PM IST
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद पदोन्नति में आरक्षण देने की मांग पर संसद के रुख से उठ रहे सवालों पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा से पीयूष पांडेय ने बातचीत कीः
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में कई मुद्दों पर की गई समीक्षा के बाद कार्यपालिका इन्हें पलटने के लिए बिल लाने पर विचार कर रही है। वोडाफोन और प्रमोशन में आरक्षण जैसे मुद्दे इसके उदाहरण हैं। इस पर आप क्या कहेंगे?

संसद सर्वोच्च है। लेकिन यह नहीं कह सकते कि शीर्ष अदालत के फैसलों को निष्प्रभावी करने के लिए संसद की ओर से विधेयक लाया जाना है। वह न्यायपालिका के फैसलों का सम्मान करती है। जहां तक संविधान संशोधनों का सवाल है, तो यह भी संसद के विवेक पर है कि समाज के बदले स्वरूप को किस तरह व्यवस्थित ढांचे में ढाला जाए। शीर्ष अदालत के एक-दो फैसलों में उलटफेर के लिए विधेयक लाने की मांग पर यदि संसद कोई कदम उठाती है, तो उसे चलन नहीं कह सकते। पदोन्नति में आरक्षण के मसले पर सर्वोच्च अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार के उन संशोधनों को रद्द किया था, जो दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं थे। इसलिए यदि पदोन्नति में आरक्षण की मांग पर संसद भविष्य में मुहर लगाए, तो इसे अदालत के खिलाफ जाना नहीं कह सकते।

संसद यदि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूरी तरह उलटने के लिए कोई नया विधेयक लाए, तो क्या यह उचित होगा?
कई बार तकनीकी अड़चन दूर करने के लिए अदालत संसद के बनाए कानून की समीक्षा करता है। उसी तरह संसद भी व्यवस्था को आधुनिक दौर या दूरगामी परिणामों को देखकर संशोधन कर सकती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि संसद को जो फैसला पसंद नहीं आता, वह उसे निष्प्रभावी करने में जुट जाती है। हां, किसी मुद्दे पर न्यापालिका के फैसले के पूरी तरह से खिलाफ जाकर कार्यपालिका ऐसा करे, तो यह अदालत की समीक्षा के साथ उचित व्यवहार नहीं माना जा सकता।

सर्वोच्च अदालत में दो अलग-अलग पीठों के ऐसे फैसले आए हैं, जो समान मुद्दे पर एक-दूसरे के विपरीत रहे हैं। क्या यह अस्वथ्य परंपरा नहीं?
बिलकुल नहीं। स्थितियों, तथ्यों और साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत निर्णय लेती है। कई बार समान लगने वाले मामलों में सैद्धांतिक तौर पर बड़ा अंतर होता है। ऐसे में यदि दो अलग पीठें सुनवाई कर फैसला लेती हैं, तो उनके निर्णयों में ऐसा होना ही चाहिए। यह एक स्वस्थ परंपरा है कि हमारी न्यायपालिका हर मामले की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए फैसला लेती है।

कानूनी शिक्षा में बीसीआई के अधिकार पर अतिक्रमण करने वाले सरकार के विधेयक को लाए जाने की क्या वजह हो सकती है? इस पर हाल ही में बार काउंसिल ने आपत्ति जताई भी थी।
इसकी वजह तो नहीं बताई जा सकती है। लेकिन मानव संसाधन मंत्रालय के कुछ लोग अमेरिका गए और वहां के तौर-तरीकों को सीधे तौर पर यहां लागू करने का मन बना बैठे। पर अमेरिका और भारत की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा फर्क है। यहां सरकार ने अभी तक सही तरीके से ढांचागत व्यवस्था तक नहीं उपलब्ध कराई और कानूनी शिक्षा की जिम्मेदारी लेना चाहती है। सरकार को कानूनी शिक्षा के बजाय पहले अन्य विषयों की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहिए।

लंबित मामलों के अंबार से पटती अदालतों को राहत पहुंचाने के लिए क्या वकीलों को भूमिका निभानी चाहिए?
सरकार ने तमाम कदम उठाए हैं, लेकिन वे कारगर साबित नहीं हुए। खाली पड़े पदों में जजों की नियुक्तियों के लिए सरकार की गति बहुत धीमी है। जजों की संख्या भी मौजूदा स्थितियों के अनुरूप नहीं है। यदि इस मामले में बार काउंसिल से कोई राय मांगी जाएगी, तो वह सहर्ष देगी।
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