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सामाजिक जिम्मेदारियों की राह

Vinit Narain

Updated Tue, 08 May 2012 12:00 PM IST
path of social responsibility
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पिछले महीने दो दिवसीय 'माइंडमाइन' सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसका एक सत्र औद्योगिक संगठनों की भूमिका पर केंद्रित था। इस सत्र का विषय था कि क्या औद्योगिक संस्थाएं समावेशी समाज का निर्माण कर सकती हैं?
जब मॉडरेटर ने दर्शकों से पूछा कि क्या वे इसका समर्थन करते हैं कि औद्योगिक घरानों के लिए सामाजिक जिम्मेदारियां अनिवार्य कर देनी चाहिए, तो बमुश्किल चार-पांच हाथ ही उठे। और जब दर्शकों में से किसी ने इस ओर इशारा किया कि आजादी के बाद भारतीय औद्योगिक घरानों द्वारा निभाई जाने वाली सामाजिक जिम्मेदारियों का रिकॉर्ड निराशाजनक रहा है और उनकी स्वैच्छिक पहल पर संदेह है, तो मंच पर मौजूद पैनलिस्ट में से दो का कहना था कि समावेशी विकास सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों पर निर्भर करता है, न कि औद्योगिक संगठनों द्वारा तैयार समावेशी समाज पर। दिलचस्प है कि अपने देश में जो समावेशी विकास दिखता है, वह बदनाम राजनेताओं की ही पहल का नतीजा है, न कि औद्योगिक घरानों का।

हकीकत यही है कि औद्योगिक क्षेत्र, बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और मीडिया के एक वर्ग ने स्वतंत्र भारत में समग्रता और सामाजिक गतिशीलता का विभिन्न स्तरों पर विरोध किया है। अधिकतर समय तो उनका ध्यान यथास्थिति और प्रभु वर्ग की विशिष्टता बनाए रखने में बीता है। स्वतंत्र भारत में सार्वभौमिक मताधिकार समावेशी समाज की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय था, जो लोगों की आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक योग्यता देखे बिना दिए गए थे।
यह अधिकार महात्मा गांधी के विचारों से उपजा था, जिसे नेहरू और अंबेडकर ने अमलीजामा पहनाया, पर उनके इस प्रयास का पूंजीपतियों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने पुरजोर विरोध ही किया। इसी तरह हिंदू कोड बिल भी महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था, पर नेहरू और अंबेडकर के अगुआ बनने के बावजूद इसे भी उच्च शिक्षित और धनाढ्य वर्गों का विरोध संसद में और संसद के बाहर, दोनों जगह झेलना पड़ा।

इतना ही नहीं, अनुसूचित जाति/जनजाति को संसद, विधानसभा या अन्य सरकारी सेवाओं में मिले आरक्षण की भी हमेशा आलोचना ही की जाती है। पर बिना ऐसे प्रयासों से क्या हमारे देश में सामाजिक गतिशीलता और समग्रता संभव है? क्या मायावती, मीरा कुमार या पासवान जैसे लोग संसद पहुंच सकते हैं? क्या समाज के वंचित वर्गों से कोई वरिष्ठ सिविल सेवक बन सकता है, जो अब भी नगण्य ही है? अगर देश में वंचितों को दी जा रही ये सुविधाएं खत्म कर दी जाएं, तो निश्चय ही कुल आबादी के इस पांचवें हिस्से से कोई प्रतिनिधि शायद ही संसद या विधानसभाओं तक पहुंच पाएगा!

रामायण-महाभारत में ऐसे ढेरों उदाहरण हैं, जिसमें ऋषि-मुनि राजकुमारों को ही शिक्षा देते थे, निम्न तबके को देखना तक उन्हें गवारा नहीं था। द्रोणाचार्य द्वारा गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य का अंगूठा मांग लेने की घटना ऐसी ही मानसिकता की परिचायक है, जिसे हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने 'घिनौना' बताया है।

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को इसलिए बार-बार कठघरे में खड़ा किया जाता था, क्योंकि उन्होंने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया था। अब वह धूल और गुबार बेशक थम गया है, पर क्या कोई इससे इनकार कर सकता है कि अनुसूचित वर्ग के लाखों बच्चे आज शिक्षित नहीं हो पाते, यदि सरकार औद्योगिक घरानों या शिक्षाविदों के आगे झुक गई होती? तो क्या यह सवाल गलत है कि इंडिया इंक सामाजिक जिम्मेदारियों से भागता है?

सकारात्मक सुधार की दिशा में उठाए गए कदमों का यह कहकर विरोध किया जाता है कि इससे सरकार प्रभावित होगी, जो कि निराधार है। कहा जाता है कि अनुसूचित जाति या जनजाति से संबद्ध इंजीनियरों द्वारा तैयार पुल कांपते हैं या ऐसे समुदाय का कोई डॉक्टर इलाज करे, तो मृत्यु की आशंका अधिक रहती है। क्या तमिलनाडु और कर्नाटक की सरकारें प्रभावित हुईं, जहां ऐसे निर्णय काफी पहले लागू कर दिए गए थे?

मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेजों में कम नंबर आने के बाद भी बेशक वंचित वर्गों के बच्चों का प्रवेश हो जाता है, पर कम नंबर आने पर वे सफल घोषित नहीं किए जाते। अंतिम परीक्षा में नियत अंक पाने के बाद ही वे डॉक्टर या इंजीनियर बनने के अधिकारी होते हैं।

सचाई यह है कि इंडिया इंक को सामाजिक जिम्मेदारी निभाने के लिए मानसिकता बनाने की जरूरत है। निजी स्कूलों में 25 फीसदी गरीब बच्चों को दाखिला देने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर चिल्लपों मचाने वाले वही लोग हैं, जो यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। लिहाजा जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी, समग्र विकास का सपना अधूरा ही रहेगा।

इंडिया इंक आरक्षण या कोटा के बजाय आर्थिक मदद की मांग करता रहा है, पर यदि वह वास्तव में समावेशी समाज के प्रति उत्सुक है, तो उसे रोका किसने है? औद्योगिक घरानों को अपने महलनुमा घरों के आधार पर प्रतिद्वंद्विता करने के बजाय अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के आधार पर एक-दूसरे से प्रतियोगिता करनी चाहिए। और इस काम में बिल गेट्स और बरेन वफेट जैसे उद्योगपति उसके आदर्श हो सकते हैं।
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