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सब्जियों का बड़ा बाजार

Vinit Narain

Updated Fri, 04 May 2012 12:00 PM IST
Larger market of vegetables
सब्जियों की पैदावार बढ़ने के बावजूद आम आदमी को जहां ऊंची कीमत चुकानी पड़ रही है, वहीं किसानों को भी उपज की उचित कीमत नहीं मिल रही है। हर साल किसान अपनी उपज सड़कों पर फेंकने को मजबूर होते हैं। आखिर कहां हो रही है गड़बड़ी? इस मुद्दे पर कृषि मंत्रालय में संयुक्त सचिव और राष्ट्रीय बागवानी मिशन के निदेशक संजीव चोपड़ा से विजय गुप्ता की बातचीत-
प्र- सब्जियों की पैदावार और शहरी क्षेत्रों में उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है। फिर भी सब्जियों की घरेलू मांग पूरी नहीं हो रही है। यह स्थिति कब तक सामान्य हो पाएगी?
उ- देश में सब्जियों की पैदावार साल दर साल बढ़ रही है। वर्ष 2011-12 के दौरान इसका उत्पादन 14.97 करोड़ टन तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष के मुकाबले लगभग 31 लाख टन अधिक है और 2009-10 के मुकाबले करीब 156 लाख टन अधिक है। चूंकि घरेलू खपत का कोई सर्वे नहीं होता है, इसलिए यह नहीं कह सकते कि सब्जियों की उपलब्धता मांग के अनुरूप कम है।

प्र-फिर भी वैश्विक परिदृश्य में भारत सब्जी उत्पादन में पीछे है। जबकि देश में हाइब्रिड सब्जियों की भी खेती की जा रही है?
उ- सब्जी उत्पादन में हम पीछे नहीं हैं। विश्व में सब्जियों की पैदावार के मामले में भारत दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। यह अचानक नहीं हुआ है। राष्ट्रीय हार्टिकल्चर मिशन (एनएचएम) के जरिये सरकार किसानों को सब्जियों के उन्नत बीज, तकनीक और आधुनिक ढंग से बागवानी के लिए प्रशिक्षित भी कर रही है। यह इसी प्रोत्साहन का नतीजा है कि मटर के उत्पादन में भारत शीर्ष पर पहुंच गया है, जबकि बैंगन, पत्तागोभी और प्याज के उत्पादन में दूसरे और टमाटर व आलू की पैदावार में तीसरे स्थान पर है।

प्र- पैदावार में लगातार बढ़ोतरी के बावजूद आम आदमी की थाली में सब्जियां कम ही आ पाती हैं। एक तरफ महंगी होने के कारण सब्जियां आम आदमी की पहुंच से दूर हैं, दूसरी ओर, लागत मूल्य न मिलने के कारण किसान अपनी उपज (आलू-प्याज, टमाटर आदि) सड़कों पर फेंकने के लिए मजबूर होते हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
उ- इसकी कोई एक वजह नहीं है, बल्कि कई कारण जिम्मेदार हैं। सरकार ने इनकी पहचान की है। इसके तहत पिछले वर्ष से शहरों के निकट सब्जियों के कलस्टर स्थापित करने की योजना शुरू की गई, जो इस समय प्रगति पर है। प्रत्येक राज्य की राजधानियों या दस लाख की आबादी वाले किसी अन्य शहर में इन कलस्टरों की स्थापना की जा रही है। इसके लिए किसान हित समूहों का गठन भी किया जा चुका है। इससे न सिर्फ किसानों को उपज बेचने का बाजार मिलेगा, बल्कि अपनी पैदावार का बेहतर दाम भी मिलेगा। जबकि शहरी उपभोक्ताओं को इन केंद्रों से वाजिब दर पर ताजा सब्जियां मिल सकेंगी।

प्र- एक तरफ किसान अनाज उत्पादन से विमुख हो रहे हैं, लेकिन सब्जियों में नुकसान के बावजूद किसानों का बागवानी में रुझान बढ़ रहा है। ऐसा क्यों?
उ- हां, यह सही है कि किसानों का रुझान बागवानी में बढ़ रहा है और इसका असर खेती पर पड़ा है। सिर्फ हरियाणा में ही 6.50 फीसदी क्षेत्र खेती से बागवानी में शिफ्ट हो चुका है। इसकी वजह है बागवानी में किसानों को उन्नत बीज, तकनीक और बेहतर बाजार मिलना। हरियाणा में इस्राइल के सहयोग से सेंटर आफ एक्सलेंस फॉर वेजीटेबल की स्थापना की गई थी। इस तरह के आठ और केंद्र जल्द ही अलग-अलग राज्यों में खोलने की योजना है।

प्र- इंडो-इस्राइल प्रोजेक्ट से आम आदमी को क्या फायदा होगा?
उ- दरअसल इस परियोजना का उद्देश्य किसानों को नई तकनीक और उन्नत बीजों के जरिये बागवानी कराना है। इससे बेमौसम में भी मौसमी सब्जियों की पैदावार संभव है। यानी कभी भी हम मनपसंद सब्जियों का स्वाद चख सकेंगे।
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