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जब नारे में तब्दील हो जाए जिंदगी: द सीक्रेट डायरी ऑफ कस्तूरबा  

ब्यूरो/ दिल्ली

Updated Sat, 12 Nov 2016 09:36 PM IST
 book review of the secret diary of kasturba
द सीक्रेट डायरी ऑफ कस्तूरबा                                     
लेखिका- नीलिमा डालमिया प्रकाशक- ट्रांक्वीबर 
प्रेस, चेन्नई
मूल्य- 699 रुपये


महात्मा गांधी से अलग करके कस्तूरबा गांधी को देखना, अपने आप में एक नई दृष्टि है। इसी पर आधारित यह किताब एक नई कस्तूरबा से मिलवाती है। यह एक विलक्षण संयोग है कि इस वर्ष दो किताबें उन कस्तूरबा पर आई हैं, जिनकी या तो बापू के प्रभावी व्यक्तित्व के आगे अनदेखी कर दी गई या जिन्हें उनके पदचिह्नों पर चलने वाला समझकर अध्ययन के काबिल नहीं समझा गया। यह स्वागतयोग्य है कि कस्तूरबा को नई रोशनी में और जरूरत पड़ने पर गांधी से अलग हटकर समझा जा रहा है। 

पहली किताब 'पहला गिरमिटिया' के यशस्वी लेखक गिरिराज किशोर ने लिखी है, तो इस पुस्तक की लेखिका रामकृष्ण और दिनेशनंदिनी डालमिया की बेटी नीलिमा डालमिया हैं, जिनके परिवार का बापू से संपर्क रहा। यह किताब लिखते हुए लेखिका को उस दौर के पत्र व्यवहारों और ब्योरों का लाभ तो मिला ही, इसके अलावा भी गहन अध्ययन और गवेषणा की छाप इस किताब में दिखती है। उन्होंने किशोरी कस्तूर का बेहद प्रभावशाली चित्रण किया है। 

विवाह के तुरंत बाद मोहनदास से उनके संबंध, दक्षिण अफ्रीका जाने और वहां जाने के बाद गृहस्थी के शुरुआती दौर में छिटपुट मुद्दों पर पति से मतभेदों के बीच हम एक अलग कस्तूर को पाते हैं, जिसके पास स्वतंत्र चेतना है और पढ़ी-लिखी न होने के बावजूद जिसके पास चीजों को समझने का अपना नजरिया है। बापू अपने बेटों की औपचारिक शिक्षा के विरोधी थे, जबकि कस्तूर इसका कई औचित्य समझ नहीं पाती थीं।

जिस एक और चीज के लिए यह किताब ध्यान खींचती है, वह है ज्येष्ठ पुत्र हरिलाल गांधी का चित्रण बिल्कुल शुरुआत से यह किताब बताती है कि बचपन में हरिलाल के दूर रहने की परिस्थितिजन्य कारणों से कस्तूर संतुष्ट नहीं थीं और उससे बिछोह उन्हें सालता था। बाद में यही दूरी खासकर पिता-पुत्र के बीच के अलगाव की वजह भी बना। लेकिन हरिलाल का मां से बेहद आत्मिक संबंध था। इसका एक बेहद प्रतीकात्मक चित्रण किताब में है। 

कटनी रेलवे स्टेशन पर खड़ी भीड़ गांधी को देखने आती है, लेकिन उसमें एक व्यक्ति नारे लगाता है, कस्तूरबा की जय। हरिलाल निकट आकर मां को एक संतरा देता है, और पिता से कहता है, बा के कारण ही आप महान बने हैं। लेखिका ने हरिलाल के जीवन का विस्तार से इस किताब में जो चित्रण किया है, वह अद्भुत है। कस्तूरबा के साथ-साथ हरिलाल को समझने के लिए भी यह किताब पढ़नी चाहिए।
आगे पढ़ें

सप्ताह की किताबें: 'मानस के राम' और 'अवशेष प्रणय'

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