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तालमेल बनाते तो बच जाती जान

Chandigarh

Updated Fri, 21 Dec 2012 05:32 AM IST
चंडीगढ़। पीजीआई के डाक्टर यदि घायल छात्रा अनुपमा के इलाज में आपसी तालमेल बनाते तो उसकी जान बचाई जा सकती थी। इलाज में लापरवाही की जांच करने के लिए बाहरी सदस्यों की प्रो. एसएस गिल की अगुवाई वाली जांच कमेटी की तकरीबन 300 पन्नों की रिपोर्ट में कुछ ऐसा ही सच सामने आया है। यह रिपोर्ट अगले कुछ दिनों में पीजीआई प्रशासन को सौंप दी जाएगी।
सूत्रों के मुताबिक अनुपमा मामले की जांच कर रही कमेटी ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली है। इस रिपोर्ट में प्रमुखता से इस बात का उल्लेख किया गया है कि अनुपमा की जान बचाने के लिए शुरुआती समय में आर्थोपेडिक विभाग के डॉक्टरों की टीम ने आपस में तालमेल ही नहीं बनाया। अगर आपस में डाक्टरों का सामंजस्य होता तो छात्रा को गैंगरीन भी नहीं होता और उसकी हालत बदतर न होती।
टीम ने तकरीबन सवा चार महीने के बाद जो रिपोर्ट तैयार की है उससे साफ पता चलता है कि अनुपमा की मौत के लिए पीजीआई की व्यवस्था भी जिम्मेदार है। पीजीआई में व्यवस्थाएं अनुरूप नहीं हैं। हालांकि इन व्यवस्थाओं के अनुरूप न होने की प्रमुख वजह पीजीआई में मरीजों की हद से ज्यादा भीड़ को कारण बताया गया है। सूत्रोें का कहना है कि जांच कमेटी ने माना है कि अनुपमा की मौत गैंगरीन की वजह से हुई है लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि अगर डाक्टरों में तालमेल होता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। उन्होंने इस रिपोर्ट में दो दर्जन सिफारिशों के साथ पीजीआई को व्यवस्था सुधारने की नसीहत दी गई है।

उपभोक्ता फोरम में भी देना है जवाब
उपभोक्ता फोरम में अनुपमा के परिजनों ने सीटीयू और पीजीआई पर 85 लाख का दावा ठोका हुआ है। उनके वकील पंकज चांदगोठिया ने पीजीआई से जांच कमेटी की रिपोर्ट का निष्कर्ष पेश करने को कहा है। फोरम में वकील ने कहा था कि अनुपमा की पट्टियां तक रोज नहीं बदली गई। इस वजह से उसे इंफेक्शन हुआ। इस पर पीजीआई ने मंगलवार को फोरम से और समय मांगा। अब पीजीआई 11 जनवरी को अपना जवाब दाखिल करेगी।

कब क्या हुआ
- 17 जुलाई को अनुपमा का सीटीयू की बस से एक्सीडेंट हुआ
- 24 जुलाई को एक सप्ताह तक पीजीआई में जिंदगी और मौत से जूझने के बाद उसकी मौत हो गई।
- 26 जुलाई को पीजीआई ने मामले की जांच के लिए आंतरिक कमेटी बनाई।
- 27 जुलाई को अमर उजाला ने कमेटी के कई सदस्यों के शहर में न होने पर सवाल उठाए तो कमेटी को बदल दिया गया।
- 2 अगस्त को प्रो. एसएस गिल की अगुवाई में बाहरी जांच कमेटी बनाई गई। यह कमेटी आंतरिक कमेटी की जांच पर सवाल उठने के बाद बनी।
- 4 महीने बाद अभी तक रिपोर्ट पीजीआई प्रशासन को नहीं सौंपी जा सकी, लेकिन जांच रिपोर्ट में कुछ ऐसे ही तथ्य सामने आए हैं।
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