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कौन है अनुपमा की मौत का जिम्मेदार!

Chandigarh

Updated Wed, 25 Jul 2012 12:00 PM IST
मासूम अनुपमा एक सप्ताह तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद मंगलवार को इस दुनिया को अलविदा कह गई। अनुपमा के परिजन जिस भरोसे से पीजीआई पहुंचे थे, वह डाक्टरों की लापरवाही की वजह से पूरी तरह टूट चुका है। उनकी बेटी का डॉक्टरों ने समय पर ऑपरेशन करना तो दूर उसके घावों की पट्टियां तक नहीं बदली। नतीजा हुआ कि उसके शरीर में संक्रमण फैलने लगा और जब सर्जरी की गई तो एक पैर तक काटना पड़ा, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। सीटीयू की लापरवाही से हादसे का शिकार हुई अनुपमा के इलाज के दौरान ही सामने आया चंडीगढ़ प्रशासन का बेदर्द चेहरा। अनुपमा के शरीर में फैल रहा जहर रोका नहीं जा सका और मंगलवार सुबह उसने लापरवाह सिस्टम पर एक बड़ा सवाल छोड़ते हुए पीजीआई में आखिरी सांस ली...
चंडीगढ़ प्रशासन और पीजीआई की ‘व्यवस्थाओं’ पर सवाल

छात्रा के इलाज में कोताही बरतने वाले सात डॉक्टरों पर कौन करेगा कार्रवाई, पीजीआई ने झाड़ा पल्ला

जब पीजीआई पहुंची थी घायल, उस वक्त छह रेजीडेंट और एक कंसलटेंट थे मौजूद

इतने डॉक्टर मिलकर भी चार दिन नहीं कर सके मरीज की ड्रेसिंग, फैला इंफेक्शन और हुई मौत

ड्राइवर के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर सीटीयू ने जिम्मेदारी पूरी कर ली

प्रशासक से लेकर हेल्थ सेक्रेटरी तक चंडीगढ़ में, मौत के बाद मुआवजे का ऐलान है उनका काम

आशीष तिवारी
चंडीगढ़। सीटीयू बस के नीचे आकर एक सप्ताह पहले घायल हुई सेक्टर 18 के गवर्नमेंट मॉडल स्कूल की छात्रा अनुपमा ने मंगलवार सुबह पीजीआई में दम तोड़ दिया। लेकिन, उसकी मौत ने संवेदनहीन पीजीआई और बेदर्द प्रशासन का चेहरा सामने ला दिया। चार दिन लापरवाही बरतने वाले पीजीआई के अफसर, मंगलवार को अनुपमा की जान जाने के बाद अपनी सफाई का ब्योरा तैयार करने में पूरी तरह मुस्तैद हो गए और प्रशासन ने तीन लाख रुपये की मदद का ऐलान करके अपनी तेजी दिखा दी। सीटीयू ने बच्ची के लिए जानलेवा बनी लापरवाही से कोई सबक अब तक नहीं लिया है। हां, एक परिवार की खुशियां छीनने के बाद संवेदना जताने और मीटिंग बुलाने का खेल जरूर शुरू हो गया है।
पिछले सप्ताह मंगलवार दोपहर बाद जब उसे पीजीआई लाया गया था तो उस वक्त ट्रामा सेंटर में उसको देखने के लिए छह रेजीडेंट डॉक्टर मौजूद थे। हैरानी की बात है कि सभी छह रेजीडेंट डॉक्टर चार दिनों तक उसकी सर्जरी तो दूर नियमित रूप से पट्टियां तक नहीं बदल सके। नतीजा हुआ कि पट्टियां न बदलने और समय पर सर्जरी न होने के कारण उसके शरीर में संक्रमण फैलने लगा और एक पैर काटने के बाद मंगलवार की सुबह उसकी मौत हो गई। यही नहीं मौत से जंग लड़ने के लिए अनुपमा को आईसीयू में बेड तक नहीं मिल सका।
पीजीआई प्रशासन ने इस मामले में अपनी लापरवाही से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया है। पीजीआई के निदेशक प्रो. योगेश चावला से लेकर ट्रामा सेंटर का पूरा प्रशासन खामोश है, लेकिन अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया है कि एडवांस ट्रामा सेंटर के रिकार्ड अनुसार छात्रा का इलाज करने के लिए छह रेजीडेंट डॉक्टर और एक सीनियर कंसल्टेंट तैनात थे। बावजूद इसके किसी भी डॉक्टर ने समय पर मरीज की गंभीरता नहीं समझी और उसके शरीर में संक्रमण फैलता रहा, जो जानलेवा बना।

दस डॉक्टरों की पूरी टीम थी ट्रामा सेंटर में
17 जुलाई को जब अनुपमा अस्पताल में दाखिल हुई उस वक्त हड्डी रोग विभाग के दस रेजीडेंट डॉक्टर मौजूद थे। सूत्रों के मुताबिक चार जूनियर रेजीडेंट आपरेशन थिएटर में थे, जबकि पांच जूनियर रेजीडेंट और एक सीनियर रेजीडेंट ट्रामा वार्ड की पेरीफेरी में थे, जबकि ऑन कॉल सीनियर कंसलटेंट डॉ. आरके कनौजिया थे।

चार दिन तक नहीं हुई रेग्युलर ड्रेसिंग
17 से लेकर 20 जुलाई तक अनुपमा की एक बार भी पट्टी नहीं बदली गई, जबकि इतने दिनों में रोज रात को रहने वाले पांच रेजीडेंट डॉक्टर और रोज दिन में रहने वाले छह रेजीडेंट डॉक्टरों ने भी ड्रेसिंग करना मुनासिब नहीं समझा।


इन सवालों पर क्यों हैं चुप
प्रशासन ने सात दिन बाद भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर अनुपमा की नियमित रूप से पट्टियां क्यों नहीं बदली गई।
किसकी जिम्मेदारी थी इन पट्टियों को बदलने और दुर्घटना की गंभीरता को जानने की।
क्यों समय पर अनुपमा की गंभीरता को देखते हुए सर्जरी नहीं की गई। क्या उसका मामला गंभीर नहीं था।
तीन बार प्रयास करने के बाद भी उसको आईसीयू का बेड तक क्यों नसीब नहीं हो सका।
(ऐसे कई सवालों के जवाब पर पीजीआई के निदेशक प्रो. योगेश चावला चुप है, वह न तो दफ्तर में मिले और न ही मोबाइल पर संपर्क हो सका)


तीन दिन तक भूखा-प्यासा रखा मेरी बेटी को...
अनुपमा के पिता अमित सरकार ने कहा कि सर्जरी करने का हवाला देते हुए डाक्टरों ने तीन-दिन तक उसकी बेटी को भूखा-प्यासा रखा। सर्जरी का इंतजार करते हुए रात और फिर सुबह हुई, लेकिन वह भूखी प्यासी रही। नतीजतन, तीन दिन तक मां-बाप की इकलौती बेटी दर्द से कराहती रही और किसी ने सुनवाई नहीं की। भूख-प्यास की वजह से उनकी बेटी का शरीर सफेद पड़ गया था, लेकिन डाक्टरों ने तरस नहीं खाया।

पापा! मेरे पैर तो नहीं कटेंगे...
पीजीआई में दाखिल होने के बाद उनकी बेटी बार-बार यही पूछती रही कि मेरे पैर तो नहीं काटे जाएंगे? अगर, काट दिए गए तो आगे मैं कैसे पढ़ूंगी।
- अमित सरकार, अनुपमा के पिता

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पहुंचा मामला
इस मार्मिक घटना को लेकर ग्लोबल ह्यूमन राइट काउंसिल के चेयरमैन अरविंद ठाकुर ने पीजीआई निदेशक समेत इलाज करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में याचिका दायर कर दी है। अरविंद ने बताया कि ऐसे लापरवाही वाले मामले में पीजीआई के दोषी डॉक्टरों के खिलाफ वह अदालत का दरवाजा भी खटखटाएंगे।

मरीजों की अनदेखी पर जा सकते हैं अदालत
अनुपमा की मौत की खबर सुनते ही जब अनुपमा की पड़ोसी एस भट्टाचार्य पहुंची तो उन्होंने पीजीआई के डॉक्टरों पर साफ तौर पर लापरवाही का आरोप लगाया और यही कहा कि भगवान न करें, ऐसा किसी और मां-बाप के साथ हो। उन्होंने कहा कि गंभीर मरीजों की अनदेखी के मामले को लेकर परिजन जल्द ही अदालत भी जा सकते हैं।
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