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हर रूप में सोना है सदा के लिए

उमेश्वर कुमार

Updated Mon, 22 Oct 2012 06:19 PM IST
As for gold for ever
भारतीयों के लिए सोना एक बहुमूल्य धातु मात्र ही नहीं, बल्कि जीवन पद्धति का हिस्सा बन गया है। जीवन के हर संस्कार को सोना से जोड़ा गया है। देश में खपत के मामले में तो इतना अधिक हो गया है कि यह देश की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ने लगा है।
कच्चे तेल के आयात के बाद देश की अधिकांश विदेशी मुद्रा इसी के आयात में खपती हैं। एक आकलन है कि 2015-16 में देश में 100 अरब डॉलर यानी करीब 55 खरब रुपये के मूल्य का सोने का आयात होगा। विश्व स्वर्ण परिषद के अनुसार, 2011 में देश में 960 टन सोने का आयात हुआ। इस सोने की कीमत देश के फर्टिलाइजर और खाद्य पर बजट में दिए जाने वाले अनुदान से भी अधिक बैठती है। हालांकि, सोने की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी से 2012 में सोने के आयात में थोड़ी कमजोरी आई है।

अर्थशास्त्र के हिसाब से सोने के आयात में खर्च की जाने वाली विदेशी मुद्राएं अनुत्पादक खर्च की श्रेणी में आती हैं। अब सरकार लगातार इस कोशिश में लगी है कि सोने को संजोकर रखने के प्रति लोगों का मोह भंग हो, लेकिन सोने में निवेश पर रिटर्न का आकर्षण इतना अधिक है कि लोग बाग सरकारी ज्ञान पर अपनी कान नहीं देते।

इसे देखते हुए अब सरकार सोने के निवेशकों को ऐसा विकल्प देना चाहती है, जिसमें उन्हें सोने के समान ही रिटर्न मिले। इसमें बैंकों से भी इस तरह के विकल्प तैयार करने को कहा गया है। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग के विकल्प को प्रचलित करने की कवायद चल रही है। इस तरह के निवेश में लाभ सोने में निवेश के जैसा ही होगा, साथ ही यह सोने को संभाल कर रखने जैसे जोखिम से मुक्त होगा।

देश में सोना खरीदने, पहनने और सहेजने का चलन वैदिक काल से ही है। वेद में सोना को हिरण्य भी कहा गया है। हिरण्य यानी जिसका हरण किया जा सके। नाम के अनुरूप दुनिया सोना के पीछे भागमभाग में लगी है। सोने का कद दुनिया के किसी भी देश की मुद्रा पर भारी है। आपके पास पड़ी किसी देश की विदेशी मुद्रा किसी दूसरे देश में न चल पाए, लेकिन आगर आपके पास सोना है तो उसे कहीं भी किसी भी विदेशी मुद्रा में बदला जा सकता है।

सोने के कारोबार से जुड़ी कंपनियों और विश्व स्वर्ण परिषद ने देश में सोने की चाहत को भुनाने के लिए लगातार कोशिश की है। अक्षय तृतीया जो मूल रूप से राजस्थान का पर्व था, अब अखिल भारतीय स्तर पर सोना खरीदने का पर्व बन गया है। इस तरह के कई पर्व सोने की खरीद से जुड़ गए हैं। इनके लोकप्रिय होने के पीछे इसमें इसके खरीदारों को लाभ मिलना रहा है।

सोने की कीमत यात्रा भी बड़ी दिलचस्प रही है। सोना लगातार अपने निवेशकों को लाभ दे रहा है। 1925 में सोने का भाव 18.75 रुपये प्रति 10 ग्राम था जो 1950 में बढ़कर 99.18 रुपये हो गया। 1975 में इसका भाव 540 रुपये था जो 2000 में उछलकर 4,400 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया। 2010 में इसका भाव 18,500 रुपये प्रति 10 ग्राम था जो अब 31 हजार रुपये के पार चला गया है।

सभी फाइनेंशियल प्लानर कहते हैं कि निवेशकों की पोर्टफोलियो में कुछ न कुछ सोना जरूर होना चाहिए। लेकिन यहां यह साफ कर दें कि उनका तात्पर्य निवेश के रूप में सोने के गहना नहीं बल्कि ठोस सोना या इसका विकल्प होता है। ठोस सोने में भी निवेश के कई विकल्प हैं मसलन सिल्ली या इसका टुकड़ा, गिन्नी या सिक्के। इसके अलावा, ईटीएफ जैसे रूप में कारोबार योग्य सोने के विकल्प। ठोस सोने को रखने में जहां जोखिम है, वहीं इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखे गए सोने को रखना और इनका कारोबार भी आसान होता है।
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