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देशी वियाग्रा तैयार, बाजार में उतारने की तैयारी

देहरादून/वार्ता।
Story Update : Sunday, February 05, 2012    12:07 PM
Indian Viagra Ready set launch in market

उत्तराखंड के पहाड़ों पर पाए जाने वाली कीडा जडी़ या यारसा गम्बू से शक्तिवर्धक और कामोत्तेजक दवा तैयार कर ली गई है। अब इस देशी वियाग्रा को विश्व बाजार में उतारने की तैयारी की जा रही है।

तकनीक का पेटेंट कराया
लंबे समय से यारसा गम्बू पर शोध कर रहे डिफेंस इंस्टीच्यूट ऑफ बायो एनर्जी रिसर्च गोरा पडा़व हल्द्वानी (डीआईबीआईआर) को इसे तैयार करने में कामयाबी मिली है। यारसा गम्बू से प्रयोगशाला में देसी वियाग्रा तैयार करने की तकनीक विकसित कर संस्थान ने इसका पेटेंट करा लिया है। डीआईबीआईआर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रेम सिंह नेगी ने बताया कि पेटेंट मिलने के बाद संस्थान ने अपनी तकनीक दिल्ली की एक दवा निर्माता कंपनी बायोटेक इंटरनेशनल को भेज दी है।

कई बीमारियों में कारगर
भारतीय वन अनुसंधान संस्थान के सेवानिवृत्त वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. एचबी नैथानी के अनुसार यारसा गम्बू या कीडा जड़ी का वानस्पतिक नाम काडिसेप्स साइनेसिस है। इसका जमीन से धंसा भाग कीडा होता है और उसके सिर पर उगा फफूंद पादप में आ जाता है। तिब्बत में यारसा का अर्थ गर्मी का घास तथा गम्बू का अर्थ सर्दी का कीडा होता है।

यारसा गम्बू से तैयार शक्तिवर्धक दवा का उपयोग खिलाडी़ करते हैं जिसका पता डोप टेस्ट में भी नहीं चल पाता है्। इस दवा का मुख्य तत्व सेलेनिम होता है जो कैंसर, एड्स, क्षय रोग, दर्द और ल्यूकेमिया आदि कई बीमारियों के इलाज में काम आता है। यह कैंसर कोशिकाओं के विखंडन को नियंत्रित करता है।

यारसा गम्बू की कीमत 17-20 लाख रूपए
भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण विभाग के सेवानिवृत्त वनस्पति वैज्ञानिक सुरेन्द सिंह बर्तवाल के अनुसार कीडा जडी समुद्र तल से 3000 मीटर से लेकर 6000 मीटर ऊंचाई तक के इलाकों में पाई जाती है। मई के बाद जैसे ही बर्फ पिघलने लगती है वैसे ही आठ टांगों वाला यह कीडा धरती में घुस जाता है और उसके सिर पर चोटी की तरह फफूंद निकल आता है।

यह फफूंद जून या जुलाई में दिखाई देने लगता है और इसके बाद लोग इसे जमा करना शुरू कर देते हैं। यारसा गम्बू की भारतीय बाजार में कीमत 9-1 लाख रूपए प्रति किलो है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह 17-20 लाख रूपये प्रति किलो की दर पर उपलब्ध है।

उत्तराखंड सरकार ने 2002 में एक आदेश जारी कर स्थानीय लोगों को ग्राम पंचायत और सहकारी संगठनों के माध्यम से इसके दोहन की अनुमति दी थी, लेकिन लोग इसे केवल राज्य वन निगम के माध्यम से ही बेच सकते थे।


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