अरावली वन क्षेत्र में दुर्लभ प्रजाति के वन्य जीवों पर संकट

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Rohtak Bureau

अरावली वन क्षेत्र में दुर्लभ प्रजाति के वन्य जीवों पर संकट -चिंकारा हिरन और लक्कड़बग्घा की प्रजातियों पर खतरा फोटो: एक से तीन तक देवेंद्र यादव नारनौल। बढ़ते औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण वन क्षेत्र कम होता जा रहा है। हालांकि कागजों में पांच साल पूर्व की स्थिति ही दर्शाई जा रही है। वन क्षेत्र के कम होने के कारण जिले में वन्य जीव जंतुओं के सामने रहने का संकट भी मंडराने लगा है। यही कारण है कि समय-समय पर रिहायशी इलाकों में वन्य जीव आने की सूचनाएं इस साल कई बार मिलीं। वहीं दो लक्कड़बग्घे भी सड़क के किनारे मृत अवस्था में मिल चुके हैं। वहीं वन्य जीवों की रखवाली के लिए जिले में केवल एक सबइंस्पेक्टर ही तैनात है। अरावली क्षेत्र में कई ऐसे जीव जंतु हैं, जो दुर्लभ प्रजाति के हैं। इनके लुप्त होने के पीछे मुख्य कारण जंगल का कटना व यहां पर पानी की कमी होना है। जिले में वन एवं वन्य जीवों के विनाश तेजी से हो रहा है। इसके लिए मानव जनित कारण सर्वाधिक उत्तरदायी है। तीव्र गति से बढ़ती औद्योगिक इकाइयां, प्राकृतिक स्थलों के विनाश व संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन के कारण वन्य जीवों के प्राकृतिक आश्रय स्थल जहां लगातार सिमटते जा रहे हैं। वहीं वन विभाग (वन्य प्राणी) द्वारा दक्षिणी हरियाणा में स्थित अरावली की पहाड़ियों में बसने वाले वन्य जीवों के संरक्षण की ओर ध्यान नहीं दिए जाने के कारण वन्य जीवों की दुर्लभ प्रजातियां संकट ग्रस्त हो गई हैं। चिंकारा हिरण व लक्कड़बग्घा हो गए बहुत कम जिला महेंद्रगढ़ की बात करें तो यहां पर स्थित अरावली की पहाड़ियों व अन्य आरक्षित वन क्षेत्रों में विचरने वाले चिंकारा हिरन व लक्कड़बग्घा जैसी दुर्लभ प्रजातियों के वन्य प्राणियों के संरक्षण की ओर विभाग कोई ध्यान नहीं दिए जाने के कारण वन्य जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। करीब दो दशक पूर्व यहां अनेक प्रकार के वन्य प्राणी मिलते थे, मगर अब वे न के बराबर हैं। वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए अब तक आरक्षित वन क्षेत्रों की तारबंदी के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। नारनौल के निकट 297 एकड़ में फैले रसुलपुर आरक्षित वन क्षेत्र में एक दशक पूर्व भी एक दर्जन से अधिक दुर्लभ प्रजाति के चिंकारा हिरण मौजूद थे, लेकिन वर्तमान की बात रहें तो यहां गिने-चुने हिरण ही नजर आते हैं। वहीं यहां की अरावली की पहाड़ियों में दो वर्ष पहले करीब चार-पांच लक्कड़बग्घा देखे गए थे। इनमें से अब एक भी नजर नहीं आता है। पानी के टैंक भी सूखे, कहां जाएं वन्य प्राणी वहीं विभाग की अनदेखी के चलते वन्य जीवों के लिए अरावली पहाड़ियों में बनाए गए पानी के टैंक भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। इस कारण वन्य जीवन अपनी प्यास बुझाने के लिए इधर-उधर भटकते रहते हैं। कई बार तो वन्य जीव पानी की तलाश में इधर से उधर जाने के लिए सड़क पार करते समय वाहनों की चपेट में भी आ जाते हैं। इस वर्ष रात्रि में दो लक्कड़बग्घे की मौत वाहन की चपेट में आने से हो गई थी। वहीं विभाग की ओर से वन क्षेत्र में पानी की टंकियां तो रखी गईं, लेकिन उनमें पानी डालना विभाग का याद नहीं रहता। जिला में है 1662 हेक्टेयर आरक्षित वन क्षेत्र महेंद्रगढ़ जिला में वन्य जीवों के विचरने के 18 आरक्षित वन्य क्षेत्र हैं, जो 1662 हेक्टेयर में फैले हैं। सलिमाबाद में 190.61 हेक्टेयर, नींबी में 121.41 हेक्टेयर, सोहला में 264 हेक्टेयर, मुकुंदपुरा में 213 हेक्टेयर, नांगलमाला में 135 हेक्टेयर, नांवा में 173 हेक्टेयर, रसुलपुर में 120, नारनौल में 72, दुलोठ में 70, खारोली में 24, गड़ानिया में 65, बुडिन में 85, डिगरोता में 44, जाटवास में 6, बसई में 11, डुलाना में 8, मियादअलिपुर में 7 व कांटी में 96 हेक्टेयर के करीब आरक्षित वन क्षेत्र हैं। ये वनप्राणी हैं जिले में जिला में चिंकारा हिरण, नीलगाय, लक्कड़बग्घा, खरगोश, गीदड़, लोमड़ी, जंगली बिल्ली, के अलावा तीतर, नेवला, सेह, सांप, गादड़, बंदर, लंगूर, काला तीतर, बटेर व मोर समेत अनेक जंगली प्राणी हैं। -------जिले में वन्य जीवों की रक्षा के लिए एक इंस्पेक्टर व एक गार्ड जिला में तैनात है। वहीं वन्य जीवों की रक्षा के लिए उनकी जांच आदि की जाती है। क्षेत्र बड़ा होने और स्टाफ कम होने के कारण कुछ दिक्कत जरूर आती है।-रजनीश कुमार, वन राजिक अधिकारी, नारनौल जिला में अनेक प्रकार के वन्य जीव मौजूद हैं। इनकी रक्षा के लिए वन्य प्राणी विभाग की ओर से पूरी कोशिश की जाती है। क्षेत्र बड़ा है, मगर स्टाफ बहुत कम है। पूरे क्षेत्र की जिम्मेवारी केवल उनके पास ही है।-बाबूलाल, उपनिरीक्षक, वन्य प्राणी, महेंद्रगढ़
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