प्रसिद्ध फिल्म निर्माता एवं निर्देशक पद्मश्री गोविंद निहलानी का कहना है कि फिल्मों पर अश्लीलता परोसने का आरोप ठीक नहीं है। अश्लीलता फिल्मों में नहीं, बल्कि देखने वाले की दृष्टि में होती है।
‘रंग दे बसंती’ और ‘ब्लैक फ्राइडे’ जैसी समाज को संदेश देने वाली फिल्में अब भी बन रही हैं। हालांकि ऐसी फिल्में बनाने वालों और देखने वालों की संख्या काफी कम है। फिल्म चाहे कामर्शियल हो या कलात्मक, अच्छी और दर्शकों का स्वस्थ मनोरंजन करने वाली होनी चाहिए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो अभियान देश में शुरू हुआ है, उसे निरंतर जारी रखना होगा। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में एक सेमिनार में भाग लेने आए निहलानी ने बातचीत के दौरान यह बातें कहीं।
आक्रोश, अर्द्धसत्य, दृष्टि, तमस, देव एवं हजार चौरासी की मां जैसी संवेदनशील फिल्में बनाने वाले गोविंद निहलानी ने कहा कि वक्त तेजी से बदल रहा है। अब बड़ी फिल्म कंपनियों को ही फंड मिलता है। कोई स्वतंत्र निर्माता अच्छे विषय पर फिल्म बनाना भी चाहे तो उसके साथ कोई निवेश को तैयार नहीं होता।
राजनीति की तरह फिल्म इंडस्ट्री में भी वंशवाद की बढ़ती परंपरा पर निहलानी ने कहा कि फिल्मी फैमिली वाले कलाकारों को ब्रेक और सपोर्ट तो आसानी से मिल जाता है, लेकिन टिकता वही है जिसमें हुनर और योग्यता होती है। उन्होंने बताया कि बच्चों को केंद्र में रखकर बनी उनकी नई एनीमेशन फिल्म ‘कमलू हैपी हैपी’ मई में रिलीज होगी।
अन्ना के आंदोलन से देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठी लहर को निहलानी एक बड़े बदलाव का संकेत मान रहे हैं। उनका कहना है कि जयप्रकाश आंदोलन के बाद यह पहला अवसर है, जब पूरे देश की जनता एक साथ सड़कों पर नजर आई। उनका मानना है कि अभी अन्ना का असर आगे देखने को मिलेगा।
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