वर्तमान वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर के 6.9 फीसदी रहने के अनुमान ने चौंकाया कतई नहीं है। मगर इस आकलन ने यह जता दिया है कि यूपीए सरकार के लिए आने वाला समय आसान नहीं है। खुद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी कह रहे हैं कि एक लाख करोड़ की सबसिडी के आंकड़े ने उनकी नींद उड़ा रखी है, तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के आकलन ने उन आशंकाओं की ही पुष्टि की है, जिसकी वजह से सरकार को बार-बार विकास दर के अपने अनुमानों को बदलना पड़ा है। याद कीजिए, हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने अप्रैल में ब्रिक्स के सम्मेलन में अनुमान व्यक्त किया था कि इस वित्त वर्ष में देश की आर्थिक विकास दर नौ फीसदी हो सकती है। लेकिन यह आंकड़ा क्यों गड़बड़ा गया, यह मनमोहन सिंह से बेहतर भला कौन जानता होगा!
ताजा आकलन इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि विकास दर पिछले तीन वर्षों में इतनी नीचे कभी नहीं रही। बल्कि पिछले दो वर्षों के दौरान तो यह आठ और 8.4 फीसदी तक रही है। मगर बीते साल के दौरान अर्थव्यवस्था हिचकोले खाती रही है। वजह चाहे जो भी हो, एक बात साफ है कि अर्थव्यवस्था की यह स्थिति घोटालों और कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी नतीजा है, जिसकी वजह से निवेश ठप पड़ा हुआ है।
इसके साथ ही यह समझने की भी जरूरत है कि यूरो जोन में छाए संकट जैसे किसी बाहरी कारणों से नहीं, बल्कि हमारी अपनी कमजोरियों के कारण अर्थव्यवस्था की रफ्तार सात फीसदी से नीचे जाती दिख रही है। अर्थव्यवस्था के कमजोर होने के लिए कृषि, खनन और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में छाई सुस्ती को जिम्मेदार माना जा रहा है। कृषि क्षेत्र का जो हाल है, उस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो स्थिति और बदतर हो सकती है।
वाकई ढाई फीसदी की सुस्त रफ्तार से आगे बढ़ रहे कृषि क्षेत्र में सुधार के बारे में सोचने का वक्त आ गया है, क्योंकि सरकार को देर-सबेर खुदरा क्षेत्र में निवेश के बारे में भी फैसला करना होगा। सरकार पर आगामी बजट में खाद्य सबसिडी को बढ़ाने का भी दबाव होगा। इसी तरह ठप पड़े खनन क्षेत्र के बारे में दूरगामी नीतियां बनाने की जरूरत है।
अभी स्थिति चिंताजनक जरूर है, मगर बेकाबू नहीं हुई है। आखिर हमारी विकास दर अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्राजील और जापान जैसे देशों से ज्यादा है। सरकार के पास मौका है कि आगामी बजट में निवेश की संभावनाएं तलाशे और देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखे।
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