|  English News  |  Education  |  AUMobile  |  Result
au
    Thursday, May 24, 2012  |  Last Update - 12:40 PM IST
साहित्य
  आप यहाँ हैं: होम » विचार » साहित्य

नेता की भाषा पर मत जाइए

सहीराम
Story Update : Monday, April 23, 2012    11:23 AM

वैसे तो नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वे कब कौन-सी भाषा बोलने लगें, कुछ पता नहीं। अब देखिए, बिहार के शतवर्षीय होने का फायदा यह हुआ कि नीतीश जी मराठी बोलने लगे। सूट-बूटवाला अंगरेजी बोलने लगे, तो यह उसका हक है। दिल्ली में रहकर कोई पंजाबी न बोले, तो ऐसा लगता है कि वह नौकरी करने ही आया है। इसी तरह लालू जी भोजपुरी न बोलें, तो लगता है, उनकी कोई पहचान ही नहीं रही। पर नीतीश जी की यह नई पहचान है।

नीतीश जी दिल्लीवालों को तो धमका लेते हैं कि दिल्ली बिहारियों के बल पर ही खड़ी है, पर मुंबईवालों को वह धमकाते नहीं। वहां वह मराठी बोलते हैं और निवेश आमंत्रित करते हैं। शिवसेना हो या राज ठाकरे, वह उन्हें खुश कर लेते हैं। जिस राज ठाकरे को बच्चन परिवार या बाल ठाकरे को शाहरुख जैसे लोग खुश नहीं कर पाए, उन्हें नीतीश जी ने खुश कर दिया। इसका अर्थ यह है कि वह मनोरंजन के इन बादशाहों से भी बड़े मनोरंजनकर्ता हैं।

बिहारियों से नाराज रहना बाल और राज ठाकरे का स्थायी भाव है। बाल ठाकरे तो फिर भी एक जमाने में दक्षिण भारतीयों से नाराज रह लिए थे, लेकिन राज ठाकरे ने अपना ध्यान नहीं बंटने दिया है। चाचा-भतीजे को कभी लगता है कि बिहारियों की वजह से मुंबई में गंदगी है, तो कभी उन्हें लगता है कि वही शहर को बिगाड़ रहे हैं।

कभी वे उन्हें सांस्कृतिक हमलावर नजर आते हैं, क्योंकि वे छठ पर्व वहां मनाते हैं। इसलिए कभी उनकी लालू जी से ठन जाती है, तो कभी किसी और से। इस बार एकबारगी तो नीतीश जी से भी ठाकरे की ठन गई थी और लोगों को लग रहा था कि नीतीश जी उन्हें भी वैसा ही धांसू जवाब देंगे, जैसा उन्होंने दिल्लीवालों को दिया था।

लालू जी वगैरह से भिड़ चुके राज ठाकरे ने नीतीश से भिड़ने की भी वैसे ही तैयारी की थी। पर अचानक ही बाजी पलट गई। नीतीश जी ने राज ठाकरे से बात की और राज उनका स्वागत करने के लिए राजी हो गए। इससे सबक यही मिलता है कि चाहे मेजबान कितना ही खुंदकी हो, बदमगज हो, उससे बात जरूर कर लेनी चाहिए। वह एक अच्छा मेजबान भी साबित हो सकता है। नीतीश जी इंडिया इंक का दिल जीत पाए या नहीं, यह तो पता नहीं, पर मराठी बोलकर वह उत्तर भारतीयों के कट्टर विरोधियों का दिल जरूर जीत गए। उम्मीद करनी चाहिए कि अब उत्तर भारतीयों की मुंबई में कुटाई नहीं होगी।


4

print

खबर पर अपनी राय दें

आप की राय -
naveen karauli, champawat
niteesh jee ne ek kushal radnitikar ka parichay diya hai.
khem karan singh, kaushambi
ये सभी नेता एक ही थाली के चट्टे बट्टे होते है
gggg, Mumbai
पहली बार कुछ लिखा है क्या.
praveen sharma, noida
mere khyal se ye bilkul sahi likha hai.
नाम    
ईमेल    
शहर    

   
कोड     
व्यंग्य की अन्य ख़बरें
प्रमुख ख़बरें
Copyright © 2012 Amar Ujala Publications Ltd.
All Rights Reserved.
Address: C-21, Sector-59, Noida-201301
Telephone No : +91-120-4694000
To Advertise (Print)   : Mediakit
To Advertise (Online) : +91-120-4694132