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चिर यौवन के योगिक आयाम

ज्योतिर्मय
Story Update : Sunday, February 05, 2012    2:44 AM

योग का सामान्य अर्थ जुड़ना और आध्यात्मिक अर्थ परमात्मा से जुड़ना है। इन दिनों योग के सामान्य और विशिष्ट अर्थ के साथ आरोग्य, ऊर्जा, यौवन और तनाव मुक्ति आदि उद्देश्य खासतौर पर जुड़ गए हैं। अपने या परमात्मा से जुड़ने में रोग, शोक, अशक्ति और तनाव प्रमुख बाधाएं हैं। इसलिए समय की जरूरत के हिसाब से स्वास्थ्य और शक्ति पर फोकस हो रहा है, तो ठीक ही है। ‘सनातन क्रिया-द एजलेस डायमेंशन’ पुस्तक में योगी अश्विनी ने रोग और जरा को जीतने के लिए कुछ व्यावहारिक उपायों पर जोर दिया है। वैसे आसन और प्राणायाम योग के आठ अंगों में से दो ही अंग है। पतंजलि ने इन्हें योग के शरीर या बाह्य रूप की तरह देखा है। धारणा, ध्यान, समाधि उसके बाद के हिस्से हैं।
योगी अश्विनी का मानना है कि बाहरी पक्ष व्यवस्थित और मजबूत न हो, तो आंतरिक पक्ष-अंतरात्मा का विकास या उसका निर्वाह मुश्किल है। सनातन क्रिया पुस्तक में बाहरी पक्ष आसन प्राणायाम और उससे सधने वाले कायिक स्वरूप को वैज्ञानिक रूप से विश्लेषण करने की कोशिश भी हुई है।
योगी अश्विनी जाने-माने योग विशेषज्ञ और शिक्षक भी हैं। योगी साधुओं की परंपरा, वेशभूषा, व्यवहार तौर-तरीकों से अलग योगी अश्विनी सामान्य जनों की तरह दिखते हैं। लेकिन योग के आयामों को उन्होंने शरीर विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, मनोविज्ञान और मनोविज्ञान और पारस्थितिकी के आधार पर विश्लेषित किया है। शरीर, उसकी कोशिकाएं, पोषण, शरीर की चयापचय प्रणाली, सौंदर्य और स्वास्थ्य के उत्पादक तत्व, श्वास, नाड़ी और हृदय की गति के आधार पर आयु की परख की कसौटियां तय की गई हैं। उस के अनुसार अपने उपयुक्त योग के चरणों और अभ्यासों का चुनाव करना यौवन को स्थायी या लंबे समय तक स्थिर बनाता है।
योगी अश्विनी का बनाया सनातन क्रिया का सेट दिनचर्या, आहार-विहार, विश्राम और सोने जागने में संयम संतुलन साधता है। इस सेट या आचार संहिता के अनुसार जीवन जिया जाए, तो लेखक का दावा है कि रोग, शोक और जरा या शरीर के क्षरण से आखिर तक बचे रहा जा सकता है। शरीर का क्योंकि जन्म होता है, इसलिए एक न एक दिन उसका मरना भी निश्चित है। चाहते तो सभी कोई हैं कि मृत्यु का दिन भी वह स्वयं ही तय करे अथवा मृत्यु को निरंतर आगे ठेलते रहो। कोई भी योगी सिद्ध या दैवी सत्ता अमर होने का आश्वासन नहीं देते, लेकिन हमेशा युवा बने रहने के लिए जरूर हौसला बंधाते हैं।
सदा युवा बने रहने का अर्थ यह भी न हो कि अस्सी वर्ष की उम्र में पच्चीस-तीस साल के युवकों की तरह उछल-कूद और भागदौड़ करते रहो। योगीजनों का मानना है कि मन और चेतना को फिर भी जीवंत बनाए रखा जा सकता है। यौवन दरअसल उत्साह और सक्रियता का नाम है। उसे बनाए रखने के लिए एक उद्देश्य का तय करना और उसके काम करते रहना जरूरी है। उद्देश्य पूरा हो जाए, तो भी ठीक और नहीं हो, तो भी ठीक। उसके लिए पल-पल जीने का आनंद इतनी बड़ी उपलब्धि है कि उसके सहारे लंबे समय तक सुख और उल्लास बनाए रखा जा सकता है।
वैदिक ऋषि अपनी प्रार्थनाओं में ‘पश्येम शरदः शतम -जीवेम शरदः शतम’ की कामना करते हैं। वे सौ वर्ष इसी चिर यौवन का नाम है, जिसका प्रतिपादन योग ग्रंथों में किया गया है।

सनातन क्रिया :द एजलेस डायमेंशन
लेखक :योगी अश्विनी
प्रकाशक :ध्यान फाउंडेशन
नई दिल्ली
मूल्यः 1200 रुपए


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