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जितनी बंदिशें लगाओगे उतनी मजबूत मुझे पाओगे ! |
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Story Update : Sunday, February 05, 2012 2:43 AM
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कोलकाता पुस्तक मेले में उनकी किताब निर्बासन के लोकार्पण में अड़ंगा डाला गया। पर तसलीमा के लिए यह कोई पहली बाधा नहीं है। 'निर्बासन' तो वे बरसों से भुगत रही हैं, लेकिन निर्वासित होकर भी वे न तो टूटी हैं, न ही हताश हैं। स्त्री के पक्ष में उनकी कलम बदस्तूर चल रही है...
कोलकाता पुस्तक मेले में चर्चित और विवादास्पद लेखिका तसलीमा नसरीन की आत्मकथा `निर्बासन’ की लांचिंग रोक दी गई। कभी कोलकाता को अपना दूसरा घर बताने वाली तसलीमा अभी भारत में ही निर्वासन की पीड़ा भोग रही हैं। एक साहित्यकार के लिए उसकी किताब और उस पर बंदिश का क्या मतलब होता है? अपनी जड़ों से उखड़ने की पीड़ा कैसी होती है? उनसे टेलीफोन पर हुई लंबी बातचीत के चुनिंदा अंश ः
कोलकाता पुस्तक मेले में पिछले दिनों आपकी आत्मकथा के सातवें खंड 'निर्बासन' की लांचिंग नहीं होने दी गई। आपकी क्या प्रतिक्रिया है? यह सचमुच बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था। कुछ मुट्ठी भर लोगों ने फिर अपनी मंशा साफ कर दी। एक लोकतांत्रिक देश में ऐसा कतई नहीं होना चाहिए था। हालांकि उसी कोलकाता पुस्तक मेले में मेरी वह किताब हाथोंहाथ बिकी है। मैं पहले भी कह चुकी हूं, अब भी कह रही हूं कि विवादों के कारण मेरी पुस्तक बिके, यह मैं कभी नहीं चाहती। फिर भी कोलकाता में मेरी किताब की लांचिंग रोकने की घटना निंदनीय तो थी ही, जिसका मैं पुरजोर विरोध करती हूं।
इससे पहले जयपुर साहित्य उत्सव में सलमान रुश्दी को नहीं आने दिया गया। और तो और, बाद में उनकी वीडियो कांफ्रेंसिंग भी रद्द कर दी गई। भारत जैसे देश में इस तरह की घटनाएं चिंतनीय हैं। जब सलमान रुश्दी जयपुर साहित्य उत्सव में आमंत्रित थे, तब हर हाल में उनको आने देना चाहिए था। अगर उनको न आने देने के लिए कुछ लोग अड़े थे, तो सरकार का दायित्व था कि वह उन्हें हर संभव सुरक्षा मुहैया कराती। लेकिन ऐसा न करके तरह-तरह के बहाने बनाए गए, कुतर्क गढ़े गए। ऐसा करके आखिर आप क्या संदेश देना चाहते हैं? बार-बार कुछ कट्टरपंथियों को क्यों खुश किया जाता है?
'लज्जा', 'आमार मेयेबेला', 'उताल हावा', 'द्विखंडितो', 'कॉ', 'सेई सब अंधोकार' जैसी आपकी किताबें यहां से लेकर वहां तक प्रतिबंधित हैं। किताबों पर प्रतिबंध लगने और निर्वासित जीवन बिताने के बावजूद आपको लगातार लिखने की ऊर्जा कहां से मिलती है? निरंतर लिखते रहने की यह प्रेरणा मुझे कहीं बाहर से नहीं, बल्कि अपने अंदर से मिलती है। मेरे भीतर की स्त्री मुझे जिलाए रखती है। मैं जितना ज्यादा टूटती हूं, उतना ही अंदर से मजबूत होती जाती हूं।
एक समुदाय विशेष का आरोप है कि आपकी किताबें सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का काम करती हैं।
एक समुदाय विशेष क्यों कह रहे हैं? खुलकर क्यों नहीं कहते? सच तो यह है कि ये लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुश्मन हैं। ये औरतों की आजादी और उनकी अस्मिता के विरोधी हैै। ये चाहते हैं कि औरत घुट-घुटकर जिए। इन्हें जो चीज अच्छी नहीं लगती, सुविधाजनक नहीं लगती, उसके खिलाफ ये फतवा जारी करते हैं। ये तसलीमा नसरीन के सिर पर इनाम रखते हैं। ये मुझे मार डालना चाहते हैं। कोई लोकतांत्रिक सरकार ऐसे लोगों के पक्ष में कैसे हो सकती है? समाज-विरोधियों को खुश करने की कोशिश आखिर क्यों की जाती है? यह गलत है, गैरकानूनी है। सरकारें अगर ऐसे लोगों को इसी तरह समर्थन देती रहेंगी, तो आने वाले दिनों में उसके नतीजे बेहद भयावह हो सकते हैं। पांच साल पहले वाम मोरचा सरकार ने जब आपको पश्चिम बंगाल से निर्वासित किया था, तब तृणमूल कांग्रेस की ओर से आपको आश्वासन मिला था कि सत्ता में आने पर वह आपको कोलकाता लौटने की अनुमति देगी। लेकिन ममता बनर्जी के शासन में ही कोलकाता में आपकी किताब की लांचिंग नहीं होने दी गई। ऐसा क्यों?
यह सवाल तो आपको ममता बनर्जी से ही पूछना चाहिए कि कोलकाता पुस्तक मेले में मेरी किताब की लांचिंग क्यों नहीं होने दी गई। हालांकि यह भ्रम है कि तृणमूल कांग्रेस मेरे प्रति नरम है। बल्कि ममता बनर्जी ने कभी मुझसे यह नहीं कहा कि सत्ता में आने पर वह मुझे कोलकाता लौटने देंगी।
लेकिन वाम मोरचे को सत्ता से बाहर करने के लिए पश्चिम बंगाल में लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों का जो समूह गठित हुआ था, उसने तब आपको राज्य से निर्वासित करने के वाम मोरचे के फैसले की सख्त निंदा की थी। उस मुहिम में महाश्वेता देवी सबसे आगे थीं। कमोबेश वही लोग आज ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द हैं।
यह बात सही है। उस समय बड़ी संख्या में लेखक-संस्कृतिकर्मी मेरे समर्थन में खड़े हुए थे। तब तुष्टिकरण की राजनीति के तहत ही मुझे पश्चिम बंगाल से बाहर निकाला गया था। उस समय लेखक-कलाकारों ने मेरे पक्ष में माहौल बनाया था। यह देखना वाकई आश्चर्यजनक है कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद पश्चिम बंगाल में कोई बदलाव नहीं हुआ। कम से कम मेरे लिए तो कुछ नहीं बदला।
आपके जीवन और उपन्यासों पर बांग्ला में फिल्म बनने की चर्चा थी। सुनने में आया है कि निर्माताओं ने उससे हाथ खींच लिए हैं।
मैंने भी यही सुना है। दरअसल वे कोलकाता के कुछ फिल्मकार थे। अब ऐसा लग रहा है कि उन्हें डरा दिया गया होगा। इसलिए उन्होंने यह योजना मुल्तवी कर दी है। तसलीमा नसरीन से सबको परेशानी है।
लगातार निर्वासन के बीच आपको मैमनसिंह के अपने घर की याद आती होगी! बिलकुल आती है। मैं घर लौटना चाहती हूं। कौन नहीं जाना चाहता? जब आपको भूख लगती है, तब क्या आप भात खाना नहीं चाहते? मेरी भी वैसी स्थिति है। लेकिन कोई मुझे अपने घर लौटने तो दे।
चर्चित बांग्ला लेखिका तसलीमा नसरीन से कल्लोल चक्रवर्ती की बातचीत
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Lax, mainpuri Very said in country like India, Congress govt is not able to protect good personalities and some can do whatever they want.
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