धर्मग्रंथों में मानव जीवन को अत्यंत दुर्लभ बताते हुए इसे सत्कर्मों के माध्यम से सफल बनाने की प्रेरणा दी गई है। पद्म पुराण में दिए गए एक आख्यान में कहा गया है, 'सत्कर्मों, विशेषकर यज्ञ, भक्ति, दान, सेवा-परोपकार के माध्यम से मानव लोक और परलोक, दोनों का कल्याण कर सकता है।' इसलिए निरंतर सात्विक कर्म करते रहना चाहिए। सत्कर्मों में रत व्यक्ति ही भक्ति के लक्ष्य तक पहुंच सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, 'कर्म का त्याग नहीं करो, वरन निष्काम भाव से किया गया कर्म ही सुख और आनंद प्रदान करने वाला होता है।' श्रीकृष्ण सात्विक व्यक्ति के लक्षण बताते हुए कहते हैं, 'आसक्ति से रहित, अहं भाव से हीन, संकटों में भी धैर्य रखने वाला, हर्ष-शोकादि विचारों से रहित और निरंतर कर्म में सक्रिय रहने वाला ही सात्विक व्यक्ति होता है।'
एक बार गांधी जी से किसी ने प्रश्न किया, 'सच्चा भक्त आप किसे मानते हैं?' गांधी जी ने बताया, 'भक्त वही है, जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता। जो अहंकार रहित है, दया का सागर है, जिसने अपने मन और आत्मा ईश्वर को समर्पित कर दिया है, वही सच्चा भक्त है।' गांधी जी लिखते हैं, 'जो कर्म में पटु है, किंतु उनमें आसक्त नहीं होता, जो सदा संतुष्ट है, जिसका संकल्प दृढ़ है, जो किसी में भय उत्पन्न नहीं करता तथा दूसरों से भयभीत नहीं होता, जो दुख और सुख से मुक्त है, जिसने अपने तर्क बुद्धि को अनुशासित कर लिया है, वही सच्चा कर्मयोगी और भक्त है।'
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