विष्णुचंद्र शर्मा हिंदी की स्वाभिमानी परंपरा के लेखक हैं। बरसों से दिल्ली में रहते हैं पर अपने बनारस और बनारसी अंदाज को अभी तक नहीं भूल पाए हैं। लाभ-हानि का गणित देखकर ही बोलने के चलन वाले इस समय में भी वे खरी-खरी कहने से बाज नहीं आते। शायद यही वजह भी है कि उन्हें लगातार हाशिए पर धकेलने के प्रयास होते रहे हैं।
1 अप्रैल, 1933 को वाराणसी में जन्मे विष्णुचंद्र शर्मा ने कहानी, उपन्यास, कविता, जीवनी, संस्मरण, आलोचना, यात्रावृत्त आदि विभिन्न विधाओं में २५ से अधिक कृतियों की रचना की है। रचनात्मक लेखन के साथ-साथ उन्होंने 1957-58 में कविता पत्रिका 'कवि' का संपादन किया। 'कहानी' मासिक और 'जनयुग' में अपनी संपादकीय प्रतिभा की पहचान कराने के बाद इन दिनों 'सर्वनाम' का संपादन कर रहे हैं। स्वािभमानी चेतना के धनी विष्णुचंद्र जी से एक मुलाकात
नागार्जुन आपके प्रिय रहे हैं और पड़ोसी भी। उनकी रचनायात्रा पर क्या कहना चाहेंगे?
आजादी से मोहभंग के अद्भुत चित्रकार हैं नागार्जुन। वे बदलते हुए भारत की राजनीतिक चेतना के कवि हैं। नागार्जुन के साथ आजादी के बाद का इतिहास लिखा जा सकता है।
आप वर्षों से दिल्ली में रह रहे हैं, लेकिन बनारस आज भी आपकी चेतना में है। दिल्ली में रहते हुए दिल्ली को किस तरह देखते हैं?
काशी कभी आजाद भारत की सांस्कृतिक राजधानी थी। आज काशी पृष्ठभूमि में है और केंद्र में है दलालों की दिल्ली। इस दिल्ली में कौन याद करता है मन्मथनाथ गुप्त को या हंसराज रहबर को। नेमिचंद्र जैन की अपनी दिल्ली थी। उस दिल्ली में केदारनाथ अग्रवाल की कोई जगह नहीं थी। इसी दिल्ली ने शिवदान सिंह चौहान की उपेक्षा ही नहीं की, उन्हें मारा भी। समझौतों से दूर रहकर दिल्ली में कलम पकड़े रहना किसी के लिए भी आसान नहीं है। राजेंद्र यादव और नामवर सिंह से भिन्न रहा है मेरा कष्टप्रद लेखन। इन दोनों की ड्योढ़ी पर आज प्रकाशक और प्रतिष्ठान अपनी थैलियां खोल रहे हैं। दिल्ली की साहित्यिक दुनिया के मेरे अपने अनुभव हैं। उन्हें लिपिबद्ध करें, तो बड़ी पोथी बन जाए।
हिंदी लेखन की मौजूदा स्थिति पर आप क्या कहना चाहेंगे?
हिंदी में आज ज्यादातर लेखक विद्यालयों के प्राध्यापक या सेठ या सरकार के चाकर हैं। उन्हें न रॉयल्टी की चिंता है, न लेखकीय जीवन यापन का अनुभव है। कटुतम अनुभव कहां अपमानजनक अनुभव में बदल जाता है, यह भी उन बैंक अधिकारी, दूरदर्शन के प्रायोजित लेखकों या प्राध्यापकों को नहीं पता। रामदरश मिश्र जब अपनी तरक्की में बाधा महसूस करते हैं, तो उन्हें शिक्षा विभाग में गंदगी नजर आने लगती है। मैंने उनकी रचनावली के लोकार्पण पर जब कुछ बातें कमलेश्वर, विश्वनाथ त्रिपाठी, विष्णु प्रभाकर आदि के सामने कहीं, तो ज्यादातर चेहरों का रंग उतर या उड़ गया था। नामवर जी ने दूसरे दिन मुझे फोन पर बधाई दी थी।
आपने अपनी पत्रिका `सर्वनाम' में आलोचक शिवदान सिंह चौहान को जगह दी और उनके ऐतिहासिक महत्व का स्मरण किया। ठाकुर प्रसाद सिंह पर भी आपने एक अंक केंद्रित किया था, क्योंकि उनके जीवन काल में उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। अपनी परंपरा और इतिहास में तुलसी और कबीर पर भी आपकी टिप्पणी मैं जानना चाहूंगा?
बहुतों ने तुलसीदास को ब्राह्मणवादी और न जाने-क्या क्या कहा। यहां तक कि हिंदी आलोचना में एक कबीरपंथ बन गया है और दूसरा तुलसीपंथ। मैं स्वीकार करूंगा कि इनमें कम लोग हैं, जो तुलसी और कबीर के अच्छे विद्यार्थी भी हैं।
सांप्रदायिकता और जातिवाद क्या एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं है? क्या जातिवादी मानसिकता के चलते सांप्रदायिक शक्तियों से मुकाबला किया जा सकता है?
शिवदान सिंह चौहान स्वीकार कर चुके थे कि संघ परिवार का गुप्त एजेंडा फासीवाद है और उससे लड़ने वाले वामपंथी कोई हैं ही नहीं। किसी जमाने में होते थे, शायद दुनिया के एकाध देश में कुछ जेनुइन वामपंथी हों, लेकिन आज वामपंथ का लेबल लगाकर चलना एक फैशन है-ऐसा समझें कि सारे तथाकथित वामपंथी मुलायम सिंह, जॉर्ज फार्नांडिस और मायावती के प्रतिरूप हैं, अपनी आक्रोश भरी, स्वार्थपरक, विघटनकारी, विध्वंसक प्रतिगामी मानसिकता में जो एक प्रकार से वर्ण व्यवस्था की ही ऑफ शूट है। ये सब दलित वर्ग के नुमाइंदे होने का दावा करते हैं, पर उद्देश्य दलित वर्ग को जहालत और दासता से निकाल कर विकास के मार्ग पर ले जाना नहीं है, बल्कि उनका नाम लेकर स्वयं को प्रतिष्ठित करना है।
वामपंथी दलित प्रश्न को उस तरह आगे क्यों नहीं बढ़ा पाए?
साहित्य के संदर्भ में ही बात करें, तो दलितवादी राजेंद्र यादव, अंबेडकर, गांधी, लोहिया पर उत्तर प्रदेश की जनता से संवाद नहीं करना चाहते हैं। प्रदीप सक्सेना खुद वामपंथ के दस्तावेज नहीं देखते हैं। मार्क्सवादी आलोचना की विशेषता मार्क्सवाद का नाम लेकर स्वयं को प्रतिष्ठित करना रहा है। राजेंद्र यादव `न लिखने की पीड़ा से ग्रस्त हैं।' राजेंद्र जुमले उछालते हैं कि `क्रांतिकारी नामवर आत्महंता के शिकार हैं' या `विश्वनाथ त्रिपाठी छापामार आलोचक हैं।' वह यह नहीं बताते कि तस्करों और घोटालों के बीच वह क्या भूमिका निभा रहे हैं। हंस',`आलोचना', `बहुवचन' और `पहल' (अब बंद) जैसी बहुचर्चित पत्रिकाएं नवधनाढ्य वर्ग की सभ्यता और संस्कृति का माध्यम बन चुकी हैं।
क्या आपको लगता है कि आज का मार्क्सवादी लेखन भ्रम का शिकार है?
मार्क्सवादी चिंतन किसी कोटर या द्वीप का लेखन नहीं होता, न शिखर पर बैठाने वालों का धोखा खड़ा करता है। वह वास्तव में आजादी के बाद संस्थान, संसद, न्यायपालिका, सेना, विश्वविद्यालयों की गिरावट पर नैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक धरातल पर बहस करता है। आजादी के बाद कोई नया सांचा नहीं बन सका।
आपने हिंदी में अनेक महत्वपूर्ण जीवनियां और संस्मरण रचे। `अभिन्न' में आपकी विशिष्ट संस्मृतियां दर्ज हैं। पर इसकी चर्चा साहित्य में कम हुई क्यों?
मैंने विजयमोहन सिंह, त्रिलोचन जी आदि को अभिन्न की प्रतियां खुद दी थीं। कुछ ने मेरे संस्मरणों में मेरी आत्ममुग्धता की शिकायत की, कुछ को लगा मैं बड़े नामों के साथ ऊंची उछाल ले रहा हूं। यह तो आलोचना का पूर्वग्रह भरा खाता है। आपने उस पुस्तक को मनोयोगपूर्वक पढ़ा। उसकी अंतर्धारा को समझा। आपने ठीक ही कहा है कि इन संस्मरणों के साथ मैं खुद से लगातार मुठभेड़ करता रहा। फिर जो लेखक नजरूल, तिलक, राहुल, मुक्तिबोध को कई कोणों से देख चुका है, वह समय के सवालों से बिना उलझे कैसे रह सकता है।
आज के ग्लोबल समय में हिंदी की स्थिति को लेकर आप क्या सोचते हैं?
एक हिंदी सत्ता की हिंदी हैं। सत्ता का रागरंग भरा उसका लेखन है, तो दूसरी हिंदी है सत्ता से बाहर की हिंदी। उस जातीय हिंदी में है देश का संघर्ष। निराला से लेकर शमशेर और रहबर से महेश्वर तक यह साहित्यिक साधना और राजनीतिक चेतना की हिंदी है। यह त्रासदीय संघर्ष की कहानी सुना रही है। सरकारी हिंदी के तीन चेहरे हैं-एक सेठाश्रयी पत्रकार का दंभभरा चेहरा, दूसरा नौकरशाह का धूर्त चेहरा और तीसरा विश्वविद्यालय या शिक्षा केंद्र में जमा हुए बुद्धिजीवियों का चेहरा। तीनों चेहरे सरकारी अनुदान से पोषित हैं। हिंदी की जातीय परंपरा से कटे हुए हैं, तीनों के पास न गर्व करने लायक अपनी भाषा है, न है अपनी परिमार्जित शैली। आजादी के बाद देश दशा का जातीय चिंतन भी वहां नजर नहीं आता।
सृजन संवाद : वरिष्ठ साहित्यकार विष्णुचंद्र शर्मा से सुधीर विद्यार्थी की बातचीत
0
खबर पर अपनी राय दें