हिंदी उपन्यास के वर्तमान पर विचार करें, तो इसकी कई धाराएं दिखाई देती हैं। एक तरफ नए मुद्दों और निषिद्ध प्रदेशों की यात्रा करती स्थापित उपन्यासकारों की रचनाएं हैं, दूसरी ओर नवोदित रचनाकारों की एक भरी-पूरी भीड़ है, जिससे कोई एक छवि नहीं बनती।
सोफी जैसा उपन्यास अगर ध्यान खींचता है, तो सिर्फ इसलिए कि इस भारी-भरकम कृति में कुछ ही पात्र हैं और इसका प्राकृतिक वर्णन ध्यान खींचता है। सोफी दरअसल प्लूटोनिक प्रेम के इंतजार में भटकती एक ऐसी युवती की कहानी है, जिसकी हसरतें अधूरी ही रह जाती हैं। पति के रूप में वह जिसे पाती है, उससे प्रेम वह नहीं कर पाती।
उस अधेड़ पति का रवैया न सिर्फ सोफी के प्रति अन्यायपूर्ण है, बल्कि अपने बेटे के प्रति भी कम तिरस्कारपूर्ण नहीं। हारी हुई सोफी एक दूसरे पुरुष के प्रति आकर्षण महसूस करती है, लेकिन उसे जो चाहिए, वह नहीं मिलता। आखिरकार उसका यह प्रेम अपने सौतेले बेटे जैमी के प्रति वात्सल्य के रूप में प्रकट होता है।
चूंकि लेखिका प्रीति रमोला गुसांई का यह पहला ही उपन्यास है, इस लिहाज से उनकी यह उपलब्धि बड़ी है, लेकिन कई मामलों में इसमें अधकचरापन भी साफ दिखाई देता है।
एक तो यही कि ट्रीटमेंट में, यहां तक कि प्रकृति चित्रण से लेकर चरित्र चित्रण तक इस पर विदेशी उपन्यासों की छाया दिखाई देती है। प्रेम की अनुभूति कितनी भी मधुर क्यों न हो, उसे अभिव्यक्त कर पाने की चुनौती हमेशा ही बहुत बड़ी होती है। इस कसौटी पर लेखिका निराश ही ज्यादा करती हैं। तिस पर संवाद आदि में कई जगह कच्चापन साफ झलक जाता है। अगली बार लेखिका को विवरणों से बचना होगा।
सोफी, प्रीति रमोला गुसांई 'मृणालिनी', चित्रांश प्रकाशन/
प्रीति बुक्स, गाजियाबाद
मूल्य-200 रुपये।
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