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साझा सरकार की सीमाएं

Story Update : Monday, February 06, 2012    11:09 PM

पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा 2 जी स्पेक्ट्रम आबंटन मामले में तत्कालीन वित्त मंत्री और मौजूदा गृह मंत्री पी चिदंबरम को सह आयुक्त बनाने की डॉ सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका खारिज किए जाने से चिदंबरम और केंद्र सरकार को बड़ी राहत मिली है। जबकि याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी ने इस फैसले पर हैरानी जताते हुए ऊपरी अदालत में जाने की बात कही है।

सवाल उठता है कि क्या पटियाला हाउस कोर्ट के ताजा फैसले से यूपीए सरकार के दामन से 2 जी घोटाले का दाग मिट गया है? इस पर दो तरह के मत हैं। विपक्ष सरकार की इस दलील से सहमत नहीं कि इस घोटाले के लिए प्रधानमंत्री और उनका मंत्रिमंडल जिम्मेदार नहीं है। जबकि संचार मंत्री कपिल सिब्बल का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल को दोषी नहीं माना है। उसने केवल आबंटन नीति को गलत माना है, जो राजग सरकार ने बनाई थी और तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा के तौर-तरीकों को गलत माना है। इसलिए प्रधानमंत्री की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है।

सिब्बल साहब का यह भी कहना है कि इस फैसले के आने के बावजूद सेंसेक्स गिरने के बजाय बढ़ गया। यानी उद्योग जगत को इस फैसले से कोई झटका नहीं लगा। कांग्रेस ने यह भी दावा किया है कि इस फैसले से गठबंधन सरकार में आने वाली दिक्कतों से बचने का रास्ता भी प्रधानमंत्री के लिए साफ हो गया है। उधर इस फैसले से निराश हुई भाजपा अब इसे उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार में ज्यादा नहीं भुना पाएगी।

लेकिन इन सबसे अलग एक महत्वपूर्ण सवाल उभरता है कि आखिर कब तक राजनीतिक दल एक-दूसरे पर दोषारोपण कर देश को असली मुद्दों के प्रति भरमाए रखेंगे। आज अगर राजग को संप्रग गठबंधन पर हमला करने का मौका मिला है, तो कल संप्रग को भी राजग पर हमले का अवसर मिल सकता है।

गठबंधन सरकार की सीमाओं और चुनौतियों पर राजनीतिक दल कभी गंभीर बहस क्यों नहीं करते? गठबंधन सरकार में शामिल होने वाले क्षेत्रीय दल जिस तरह मंत्रिमंडल में अपने दल के नेताओं को मंत्री बनावाते हैं और उनके लिए महत्वपूर्ण मंत्रालयों की मांग करते हैं, उससे गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री की दशा बड़ी दयनीय हो जाती है।

ए राजा जैसे मंत्री प्रधानमंत्री के निर्देशों की उपेक्षा करते हैं और करुणानिधि से निर्देश लेते हैं, पर विपक्ष इसे अनदेखा कर सीधे प्रधानमंत्री पर हमले करता है, जो स्वाभाविक भी है। लेकिन क्या ऐसे हमले से कुछ हासिल होता है? भ्रष्टाचार पर अंकुश लग पाता है? या आरोपियों को सजा मिल पाती है? बोफोर्स तोप घोटाला, हवाला घोटाला, स्टांप ड्यूटी घोटाला, बैंक घोटाला, चारा घोटाला, तहलका कांड जैसे कितने ही घोटाले सामने आए, पर उसका हुआ क्या? कितने आरोपी जेल के भीतर गए? कहना अतिशयोक्ति नहीं कि किसी को सजा नहीं मिली।

राजनीति का मकसद है, आम आदमी की संपन्नता और खुशहाली बढ़ाना। पहले ‘सकल घरेलू उत्पाद' (जीडीपी) की बात होती थी, अब जीएनएच (ग्रास नेचुरल हैप्पीनेस) यानी लोगों की खुशहाली बढ़ाने की बातें हो रही हैं। लेकिन अगर सरकार लोगों की खुशहाली बढ़ाने के लिए कोई निर्णय लेना चाहती हो, पर गठबंधन के सहयोगी दल उस पर सहमत नहीं हों, तो सरकार क्या करेगी? अगर गठबंधन के सहयोगी दल भ्रष्ट आचरण करें और रोकने पर सरकार गिराने की धमकी दें, तो प्रधानमंत्री क्या करें? जिस तरह 2 जी मामले में हुआ, सब कुछ को अनदेखा कर क्या वह नैतिकता की दुहाई देकर अपनी सरकार गिर जाने दें। अगर इस तरह सरकारें गिरने लगीं, तो इटली की तरह साल भर में कई-कई प्रधानमंत्री शपथ लेंगे। ऐसे में न केवल देश की प्रगति बाधित होगी, बल्कि निवेशकों का भरोसा भी खत्म हो जाएगा और देश में अराजकता बढ़ जाएगी। तो फिर ऐसे में क्या किया जाए?

यह ऐसा समय है, जब राजनीतिक जीवन में भ्रष्टाचार ने गहरी जड़ें जमा ली हैं। पर यही अवसर है कि राजनीतिक दल इन घोटालों और घपलों से देशवासियों को राहत दिलाने की कोशिश कर सकते हैं। सभी राजनीतिक दलों और जागरूक लोगों को देशहित में मिलकर कुछ ठोस फैसले लेने होंगे। मसलन, गठबंधन की शर्तें क्या हों, गठबंधन में शामिल सहयोगी दलों को अनुचित दबाव डालने से कैसे रोका जाए, सरकारें अपने संसाधनों का आबंटन किस तरह करे कि पारदर्शिता भी बनी रहे और देश को लाभ भी हो ? यानी सरकारी तंत्र से घोटालों की गुंजाइश खत्म करने के लिए गंभीरता से सोचने का वक्त है यह।

मगर दुख की बात यह है कि घोटाले सामने आने पर शोर तो खूब मचता है, पर घोटालों को रोकने के लिए कैसे व्यवस्था को पारदर्शी और जिम्मेदार बनाया जाए, इस पर सहमति नहीं बन पाती। चाहे केंद्रीय सतर्कता आयोग को स्वायत्तता देने की बात हो या ठेके, आबंटन और लीज में पारदर्शिता लाने की। ये सब ऐसे मामले हैं, जिन्हें ठोस और क्रांतिकारी परिवर्तनों के बिना सुलझाया नहीं जा सकता। घोटाले का उबाल उतरते ही मीडिया भी ढीला पड़ जाता है, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि घोटालों के कारणों को उजागर करने से लेकर उसे मुकाम तक पहुंचाने में मीडिया की भूमिका उसी तरह होनी चाहिए, जिस तरह घोटालों के उजागर होने के समय होता है।

अगर व्यवस्था परिवर्तन के तमाम बिंदुओं पर गंभीर और सकारात्मक बहसें चलेंगी, तो जनता भी जागरूक होगी और व्यवस्था पर भी दवाब बनेगा। पिछले वर्ष भ्रष्टाचार के विरुद्ध चले लंबे आंदोलन के बावजूद समाधान के बिंदुओं पर कोई गहरी चर्चा नहीं हुई। पूरी बहस इसी एक बात के आसपास सिमटकर रह गई कि आप लोकपाल के साथ हैं या उसके खिलाफ। इसी का नतीजा है कि अब सब कुछ ठंडा पड़ गया। अगर सुधार लाने का यह प्रयास राजनीतिक जमात, न्यायविद्, मीडिया व सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर प्राथमिकता से नहीं करेंगे, तो नित नए घोटाले उजागर होते रहेंगे। न तो आरोपियों को सजा मिल पाएगी और न ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकेगा। जिस भावना से दिवंगत कवि दुष्यंत कुमार ने कहा था कि 'सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं', वैसी ही भावना देश के राजनीतिक नेतृत्व के मन में भी उठनी चाहिए।


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सरकार बार बार गिरे तो सही तभी उसका हल निकलेगा अभी तो भ्रष्टाचार का हल निकालो उसको रोको मजबूरी में इज्जत तो नहीं गंवा सकते हैं।
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