|  English News  |  Education  |  AUMobile  |  Result
au
    Thursday, May 24, 2012  |  Last Update - 12:28 PM IST
कॉलम
  आप यहाँ हैं: होम » विचार » कॉलम

शहर में अकेली स्त्री

Story Update : Saturday, February 04, 2012    11:07 PM

भीड़भाड़ से भरे हमारे महानगरों में आम लोगों के लिए दिनोंदिन सहज बैठने, बोलने-बतियाने की सार्वजनिक जगहें घट रही हैं। शहरी जीवन में खुले फुरसती स्पेस और सार्वजनिक आनंद के क्रमिक लोप पर हिंदी में काफी कुछ लिखा भी जाता रहा है। लेकिन गौर से देखें, तो लगने लगता है कि जब इस दिशा में हमारी शहरी व्यवस्था को बनाने और उस पर कानून-व्यवस्था लागू करने वालों की कल्पना धारा बढ़ती भी है, तो कमोबेश शहरी पुरुष प्रजाति के ही संदर्भ में।

नतीजतन सार्वजनिक पार्कों या समुद्र तटों में बैठने की जगहों, शौचालयों या चढ़ने उतरने में आसान बसों या शेल्टरों तथा पुलिसिया निगरानी की योजनाएं बनाते समय कहीं भी महिलाओं, बूढ़ों, विकलांगों की सुविधा और गरिमा का खास खयाल नहीं रखा जाता। अवैध अतिक्रमण हटाकर सार्वजनिक भूमि जनता को सामूहिक उपयोग के लिए वापस लौटाने के लिए जब जनहित याचिकाएं डालीं और मशहूर केस लड़े भी जाते हैं, उस समय भी शायद ही कभी गंभीरता से सोचा जाता हो कि जब वे सार्वजनिक स्थल जनता को दोबारा वापस मिल गए, तो इस बार उनका सहज सुख उठा सकने में औरतों को भी पुरुषों की ही तरह बराबर का भागीदार कैसे बनाया जा सके?

आखिर हमारे शहरों में आर्थिक तौर से ऐसी आत्मनिर्भर महिलाओं की तादाद हर वर्ग में बढ़ रही है, जो शादीशुदा नहीं, अथवा किन्हीं वजहों से पति-परिवार के संबल के बिना अकेली अपने बच्चों को पाल रही हैं। सप्ताह भर घरेलू तथा दफ्तरी कामों में खटने वाली और किसी छोटी-सी किराये की जगह में रह रही इन युवतियों को भी अपने दैनिक जीवन में कई बार सुरक्षित एकांत की तलब होती है। पर जब वे बिना टोकाटाकी के अकेली टहलना या किसी एकांत कोने में बैठना चाहती हों, तो पार्क, बीच या चायखाने सरीखे शहरी सार्वजनिक स्थल उनके लिए अकसर निरापद नहीं साबित होते। ऊपर से वे भले कुछ कहें, खुले आसमान तले किसी पार्क या मैदान में इधर उधर घूमती या बैठी हुई अकेली अपरिचित (यानी माताजी, भाभी जी, बहन जी की कैटेगरी से बाहर की) युवा औरत अधिकतर शहरी निगाहों में संदिग्ध ‘माल’ है।

पुलिस, जिसका एक काम औरतों की खुले इलाकों में पूरी सुरक्षा सुनिश्चित कराना भी है, उसकी मदद से पहले हर अकेली औरत से कड़वाहट से पूछती है कि वह अकेली वहां कर क्या कर रही है? अगर वह विपन्न और कामगार श्रेणी की युवती दिखाई देती हो, तब तो लगे हाथ इसके साथ दो-तीन अपमानजनक संभावनाएं भी इस बाबत व्यक्त कर दी जाती हैं कि वह वहां अकेले में क्या तलाशती होगी। बहुत दिन नहीं हुए, जब देर रात की पाली से घर लौटती एक युवा महिला पत्रकार की हत्या के प्रसंग में पुलिस की ढिलाई पर सवाल उठने के बजाय एक महिला वीआईपी की निर्मम टिप्पणी थी कि लड़कियों (यानी भले घर की) को इतनी रात गए, अकेले सड़कों पर आना जाना ही नहीं चाहिए।
हमारे शहरों में बढ़ते अपराधों के संदर्भ में विशेषज्ञों द्वारा महिलाओं द्वारा सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक सुविधाओं के इस्तेमाल की सीमाओं तथा संभावनाओं पर शोध करना जरूरी है।

इससे जो मामले शहर दर शहर उजागर होंगे, वे रोचक तो होंगे ही, उनकी मार्फत पुरुषों की तुलना में औरतों द्वारा सार्वजनिक स्थलों के सहज उपयोग और शहर में संचरण क्षमता की असलियत से भी परदा उठेगा। साथ ही, समाज तथा पुलिस-प्रशासन की मानसिकता के वे कई दबे-छिपे कोण भी उजागर होंगे, जो हमको दिखाएंगे कि लाडली और बेटी बचाओ अभियान सरीखी योजनाएं रचनेवाला हमारा राज-समाज दरअसल औरतों को दिन ढलते ही अपने घरों के भीतर बंद देखने का पक्षधर है। अंधेरे में अकेली घर से बाहर निकलने वाली औरत की सुरक्षा की कोई गारंटी वे नहीं लेते।

‘टिस’(टाटा इंस्टीट्यूट फॉर सोशल साइंसेज) की तरफ से मुंबई की महिलाओं और उस महानगर के बचे- खुचे सार्वजनिक इलाकों की तीन महिलाओं, एक प्रोफेसर, एक आर्किटेक्ट और एक पत्रकार द्वारा तैयार (पेंगुइन प्रकाशन से आई) पुस्तक, व्हाय लौइटर? वीमेन ऐंड रिस्क ऑन मुंबई स्ट्रीट्स, उपरोक्त बातों की तसदीक करती है। लेखिकाओं ने पाया है कि संविधान की दी संचरण की आजादी शहरी महिलाओं के संदर्भ में एक मिथक है।

शहरी संस्कृति और उसके तहत विकसित स्थापत्य और सार्वजनिक निर्माणों का ढांचा सब लगातार महिला पर दबाव डालते हैं कि वे जब मन किया, अकेली बाहर का रुख न करें। अगर वे न मानीं, तो उनकी नैतिकता, उनका चारित्रिक प्रोफाइल और पारिवारिक पृष्ठभूमि सब पर सवालिया निशान लगाए जा सकते हैं। और यदि उनसे बदसुलूकी हुई, तो बहुत कम लोग उनके पक्ष में खड़े होंगे।


जिस देश के अधिकतर शहरी पार्क हिंसा पर उतारू आवारागर्दों, नशेड़ियों के अड्डे, जहां की शहरी सड़कें महिलाओं के साथ शारीरिक बदसुलूकी और भद्दी छेड़छाड़ की सर्वसुलभ स्थलियां और जिसके थाने महिला कांस्टेबिलों की उपस्थिति के बावजूद अकसर हैवानियत के केंद्र साबित होते रहे हों, वहां लेखिकाओं की यह मांग कि महिलाओं को अपनी आजादी का सही स्वाद ले पाने के लिए पहले अपने शहर के सार्वजनिक इलाकों में अपनी अनिर्बाध और स्वैच्छिक आवाजाही के हक की बहाली तय करानी होगी। दरअसल हमारे राज-समाज में एक बहुत बड़े बुनियादी बदलाव की स्वस्थ मांग है।

सौ टके का सवाल यह कि हर वर्ग में मौजूद भुक्तभोगी महिलाओं द्वारा शहरी सार्वजनिकता में अपने हक तथा सुरक्षा की बहाली तय कराने की सही राह क्या हो। कुछ समय पहले शहरी सड़कों पर छेड़छाड़ के विरोध में पश्चिम से प्रेरणा लेकर जो बेशर्मी मोरचा आयोजित किया गया था, वह मीडिया की भरपूर पब्लिसिटी के बावजूद टांय-टांय फिस्स हो गया, क्योंकि उसका स्वरूप, विरोध का तरीका और भागीदारों की वर्गचेतना की दीवार सार्वजनिक भागीदारी के आड़े आती थी। महिलाओं को राज-समाज को यह विश्वास दिलाना होगा कि जब वे सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक यातायात साधनों में अपनी सुरक्षा और मुक्त आवाजाही की बात कर रही हैं, तो उनकी मंशा अपने वर्ग तक ही सीमित नहीं और उनकी सुरक्षा की पक्की गारंटी हर शहर में धीमे-धीमे पूरे राज-समाज की सुरक्षा और जीवन की बेहतरी की राह खोलेगी।

हाल के सफल शहरी धरनों का जायजा लेने से दिखता है कि स्वभाव से अपेक्षया शांत और अहिंसक महिलाओं की एकजुटता का हर छात्र, किसान या जातीय आंदोलन और हर अभिभावक आंदोलन ने लगातार सफल उपयोग किया है। यदि महिलाएं कायदे से लामबंद हों और इस आंदोलन को सिर्फ अपनी निजी मांग के बजाय पूरे शहर के शांतिप्रिय नागरिकों, खासकर बूढ़ों और बच्चों की सहज जरूरतों से भी जोड़ सकें, तो इसका आधार तो विस्तृत होगा ही, इसके फलादेशों से शहरी संरचना, सड़कों भवनों का स्थापत्य और पुलिस की उपस्थिति के सवालों पर भी रचनात्मक तरीके से पुनर्विचार
हो सकेगा।


2

print

खबर पर अपनी राय दें

आप की राय -
Aarit Singh, noida
ye lekh bhut hi acha hai, aur hamhre sammaz ko es or dosh kadam udane chaiye,taki akli rahe wali mahilaye apne aap ko save mahsush kar sake.
z hasan, delhi
worst will happen , you are working against natural laws or divine laws.
नाम    
ईमेल    
शहर    

   
कोड     
मृणाल पाण्डे के अन्य कॉलम
प्रमुख ख़बरें
Copyright © 2012 Amar Ujala Publications Ltd.
All Rights Reserved.
Address: C-21, Sector-59, Noida-201301
Telephone No : +91-120-4694000
To Advertise (Print)   : Mediakit
To Advertise (Online) : +91-120-4694132