एंट्रिक्स-देवास सौदे की जांच को लेकर गठित प्रत्यूष सिन्हा समिति की रिपोर्ट में जिस तरह इसरो के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर और अन्य तीन अंतरिक्ष वैज्ञानिकों पर कार्रवाई करने की सिफारिश की गई है, उसके कई अर्थ हैं। ऐसा लग रहा है, मानो माधवन नायर को खलनायक साबित करने की कोशिश हो रही है। पर क्या वास्तव में वह खलनायक की भूमिका में हैं? ऐसा नहीं है।
अभी न तो अदालत ने और न ही किसी अन्य एजेंसी ने यह माना है कि माधवन इस पूरे मामले में दोषी हैं, इसलिए उन पर हमलावर होने का कोई तुक नहीं है। असल में यह पूरा मामला उलझा हुआ है और इसमें जमकर सियासत हो रही है। यानी माधवन को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
एंट्रिक्स-देवास सौदे की पेचीदगी को समझने की जरूरत है। पिछले वर्ष जब यह मामला उठा था, तब 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा की गरदन फंसी हुई थी। विपक्ष कैग की रिपोर्ट आने के बाद हमलावर था, जिसमें कहा गया था कि ए राजा के समय स्पेक्ट्रम आवंटन में पौने दो लाख करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। लेकिन दूरसंचार घोटाले में प्रधानमंत्री की सीधी भूमिका सामने नहीं आई थी।
लिहाजा ऐसे वक्त में यह सूचना सार्वजनिक की गई कि एंट्रिक्स-देवास समझौते में 2 जी स्पेक्ट्रम से भी बड़ा घोटाला हुआ है। इसे दो लाख करोड़ रुपये का 'महाराजा' घोटाले की संज्ञा दी गई। चूंकि राजा का घोटाला संचार भवन पर आकर ठहरा था, लिहाजा प्रधानमंत्री के पास अंतरिक्ष विभाग होने की वजह से इसे तूल दिया गया। बेशक यह मानने में ऐतराज नहीं है कि एंट्रिक्स-देवास समझौते में चूक हुई है, पर असल में यह प्रक्रियागत गलती है।
इसमें किसी भी वैज्ञानिक को व्यक्तिगत लाभ नहीं हुआ है। इसका जिक्र बीके चतुर्वेदी और रोडम नरसिम्हा की समिति ने भी किया है। इस समिति का गठन प्रत्यूष सिन्हा समिति से पहले किया गया था। उसमें साफ कहा गया है कि नीतिगत गलती हुई है, लेकिन इसमें किसी घोटाले की बू नहीं है। लिहाजा यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि इस पूरे मामले को गलत तरीके से पेश किया गया है। जिस व्यक्ति के सिर चंद्रयान जैसे अभियानों की सफलता का ताज सजा है, उसे बेवजह फंसाने की कोशिश की गई।
इस विवाद को इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के मौजूदा प्रमुख राधाकृष्णन और माधवन नायर के बीच की रस्साकशी के आईने में भी देखना चाहिए। दो लोगों के बीच के इस विवाद का खामियाजा बेवजह अन्य अंतरिक्ष वैज्ञानिक और इसरो, दोनों भुगत रहे हैं। इससे इसरो की कार्यप्रणाली और उसकी नीतियों पर सवाल तो उठ ही रहे हैं, उसकी छवि को भी गंभीर नुकसान हो रहा है।
इसरो दुनिया के शीर्ष छह अंतरिक्ष एजेंसियों में शुमार है और जिस तरह इस विवाद को उठाया जा रहा है, उससे विश्व समुदाय में यही संदेश जा रहा है कि इसरो में पारदर्शिता का अभाव है। अब पूर्व प्रमुख माधवन राधाकृष्णन पर साजिश रचने का आरोप लगा रहे हैं। उनका तर्क है कि प्रत्यूष सिन्हा समिति ने जिस कार्रवाई की सिफारिश की है, उसके पीछे राधाकृष्णन साहब का दिमाग है। उनके इस तर्क में दम भी दिखता है।
बी के चतुर्वेदी समिति में जो दो लोग थे, उनमें एक खुद बी के चतुर्वेदी भी थे, जो कैबिनेट सचिव रह चुके हैं, जबकि दूसरे रोडम नरसिम्हा अंतरिक्ष वैज्ञानिक हैं। दूसरी ओर, प्रत्यूष सिन्हा समिति के कुल पांच लोगों में अंतरिक्ष विभाग से सीधे जुड़े राधाकृष्णन और नमिता प्रियदर्शिनी भी थीं। बी के चतुर्वेदी समिति ने प्रक्रियागत त्रुटियों की तरफ इशारा किया, जबकि वह अंतरिक्ष विभाग से जुड़ी हुई नहीं थी, लेकिन अंतरिक्ष विभाग के पदाधिकारियों वाली प्रत्यूष सिन्हा समिति ने माधवन के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की। ऐसे में माधवन नायर का यह आरोप बेबुनियाद नहीं कि राधाकृष्णन शिकायतकर्ता होने के बावजूद प्रत्यूष सिन्हा समिति में जज की भूमिका में क्यों थे।
इस पूरे मामले में सेल्यूलर ऑपरेटर्स की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। वे अभी उस बंदर जैसे लग रहे हैं, जो इसरो और रक्षा मंत्रालय नामक दो बिल्लियों के बीच विवाद सुलझाने के बहाने अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। जिस तरह गृह राज्यमंत्री नारायणसामी यह बयान दे रहे हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा की वजह से एंट्रिक्स-देवास सौदा रद्द किया गया है, न कि स्पेक्ट्रम बिक्री में कथित नुकसान की वजह से, वह स्पष्ट इशारा है कि तीर कहीं और चलाने की कोशिश हो रही है।
यह सर्वविदित है कि जिस एस-बैंड को लेकर यह पूरा विवाद है, उसका इस्तेमाल मात्र सैटेलाइट फोन में हो सकता है, जबकि आम लोगों की मोबाइल सेवाओं के लिए सेल्यूलर ऑपरेटरों को टेरेस्ट्रियल स्पेक्ट्रम आवंटित की जाती है। लिहाजा यह कहना गलत नहीं होगा कि इस पूरे मामले को उलझाकर सेल्यूलर ऑपरेटर इस जुगत में हों कि एस-बैंड के स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल टेरेस्ट्रियल के लिए हासिल किया जा सके। दिलचस्प है कि एस बैंड और टेरेस्ट्रियल स्पेक्ट्रम के लिए अलग-अलग रकम तय होती है, लेकिन एंट्रिक्स-देवास समझौते में जिस दो लाख करोड़ रुपये की हानि की बात की जा रही है, उसकी गणना टेरेस्ट्रियल स्पेक्ट्रम की दर से की गई, जबकि उसे एस बैंड सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के हिसाब से करनी चाहिए थी।
बहरहाल, अभी यह मामला अदालत में विचाराधीन है, और यहीं इस पूरे मामले की विद्रूप तसवीर भी उभरती है। असल में सरकार ने भले ही इस समझौते को रद्द कर देवास को अग्रिम भुगतान लौटने की बात कही है, पर देवास इसके लिए तैयार नहीं है। वह समझौते की बहाली के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रहा है।
हमारे नीति नियंताओं को लगता है कि इसरो यह मुकदमा हार जाएगा, लिहाजा एक कोशिश अदालत से बाहर देवास के साथ मामले को निपटाने की भी हो रही है (जिसकी शुरुआत 12 अप्रैल से हो रही है), तो दूसरा प्रयास इस पूरे समझौते को ही गैरकानूनी साबित करने की हो रही है। प्रत्यूष सिन्हा की रिपोर्ट इसी की कड़ी है, जिसमें इस समझौते पर सवाल उठाया जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में इसरो की छवि को घटिया राजनीति में घसीटा जा रहा है।
(लेखक वरिष्ठ विज्ञान पत्रकार हैं)
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