आद्य शंकराचार्य जी ने ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या बताते हुए लिखा है, ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरा। अर्थात ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है। यह जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है। आचार्य शंकर भी जगत को मिथ्या बताते हुए कहते हैं, 'जगत के लोग आत्मा रूपी सुखसागर में निमग्न हैं।
आश्चर्य यह है कि सुखसागर में आकंठ निमग्न रहते हुए भी उस सुख राशि एवं आनंदरूपता का आचमन तक नहीं करते। ' आश्चर्यमेतेन मृगतृष्णाकामे, भवाम्बु राशौ रमतेमृषैव। वे झूठे संसार में रमण करने को लालायित रहते हैं।
महर्षि याज्ञवल्क्य वृहदारण्यकोपनिषद् में कहते हैं, 'सुख पत्नी, पुत्र, धन आदि से नहीं मिलता है, बल्कि यह सुख तो आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने वाले को अपने अंदर से मिलता है। जीवन स्वयं परमानंदमय है। जिस दिन वह इस आत्म तत्व को जान लेता है, सभी प्रकार के दुखों से स्वतः मुक्ति पा जाता है।'
संसार में रहते हुए भी किस प्रकार भगवद्भक्ति, संयम, मर्यादा, सेवा, परोपकार जैसे साधनों से मानव सहज ही में अपना कल्याण कर सकता है, इसका विवेचन विभिन्न धर्मग्रंथों व नीतिशास्त्रों में किया गया है।
विष्णु पुराण में कहा गया है, 'जो सांसारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए भी शील, संयम, मर्यादा जैसे सद्गुणों को दृढ़ता से धारण किए रहता है, हृदय में दया-करुणा की भावना समाहित किए रहता है, अपने मन को सदैव निर्मल बनाए रखता है, उसे निश्चय ही विष्णु लोक में स्थान मिलता है।'
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