|  English News  |  Education  |  AUMobile  |  Result
au
    Thursday, May 24, 2012  |  Last Update - 12:22 PM IST
आखिरी कोना
  आप यहाँ हैं: होम » विचार » आखिरी कोना

एक जूते का सवाल है

राजेंद्र शर्मा
Story Update : Tuesday, January 31, 2012    9:29 PM

एक, और सिर्फ एक जूते का सवाल है। पूरी जोड़ी भी नहीं, सिर्फ एक जूता। जूता कोई भी, कैसा भी हो, चलेगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह चमड़े का है, कपड़े का है या स्पोर्ट्स शू है। वह नामी ब्रांड का हो सकता है या अनाम कसबाई दुकान का भी। यहां तक कि जूता ही हो, यह भी जरूरी नहीं है, सैंडल-चप्पल कुछ भी चलेगा। बस, उसका पांव में पहने जाने से कनेक्शन होना चाहिए। इसकी भी कोई बाध्यता नहीं है कि जूता ठीक निशाने पर ही लगना चाहिए। बस! उसे सार्वजनिक रूप से उछाल दिया जाए। वरना जंगल में मोर नाचा किसने देखा!

हे! पदत्राण उर्फ जूता फेंकनहारे भैया, इस कृपाप्रार्थी पर भी कुछ कृपा करो। एक बार, बस एक बार जूता फेंक दो। हमें भी इसका एहसास है कि इस समय वीवीआईपी लोगों की तरफ जूता उछालने में आप कितने व्यस्त होंगे। चुनाव के सीजन में आप की डिमांड कितनी बढ़ जाती है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। कभी टीम अन्ना, तो कभी राहुल भैया, तो कभी कोई और।

निशाने की भला क्या कमी है। लोगों ने तो कहना भी शुरू कर दिया है कि इस बार चुनाव में भाषण-वायदे कम और जूते ही ज्यादा चलेंगे। खैर! इस गरीब याचक पर भी प्रभु एक बार तो कृपा करो। फिर देखना, हमारी भी इमेज बन जाएगी। जूता चलाने में भी खास के पक्ष में आम के साथ भेदभाव, यह तो न्याय नहीं है।

बेशक, जूता फेंकनहारों के फेंके जूते अब राजनीतिज्ञों और अर्द्ध राजनीतिज्ञों के महत्व का पैमाना बन चले हैं। कहते हैं कि दुनिया अब ज्यादा से ज्यादा दो तरह के लोगों के बीच बंटती जा रही है-जूता फेंके जाने योग्य माने गए लोग और जूता फेंके जाने के अयोग्य माने गए लोग।

जिसकी ओर जूता नहीं आया, उसका पॉलिटिक्स में होना भी कोई होना हुआ लल्लू! इसीलिए, हमारी भी हाथजोड़ी विनती है कि कृपा करके एक जूता हमारी ओर भी उछलवा दिया जाए। भैया जूता फेंकनहारे, अगर अब भी तुमने इस गरीब की सुध नहीं ली, तो फिर कभी आपको जूता फिक्सिंग के आरोपों का सामना करना पड़े, तो हमसे कुछ मत कहिएगा।

वैसे चुनाव आयोग को भी इस मामले में सबके लिए समान अवसर यानी लेवल प्लेइंग फील्ड सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए। यह क्या कि किसी को तो दे जूता, दे जूता, और किसी के लिए जूते का सूखा। जूते के इंतजार में उस बेचारे की आंखें तकती रह जाए। सबके लिए जूता फिंकवाने का मौका उपलब्ध कराया जाना चाहिए। न हो तो खुद चुनाव आयोग को इस संबंध में कोई दिशा-निर्देश जारी करना चाहिए।


0

print

खबर पर अपनी राय दें

नाम    
ईमेल    
शहर    

   
कोड     
तमाशा की अन्य ख़बरें की अन्य ख़बरें
प्रमुख ख़बरें
Copyright © 2012 Amar Ujala Publications Ltd.
All Rights Reserved.
Address: C-21, Sector-59, Noida-201301
Telephone No : +91-120-4694000
To Advertise (Print)   : Mediakit
To Advertise (Online) : +91-120-4694132