किसी प्रदेश में अगर हर दिन औसत छह सरकारी कर्मचारी सरकारी दल के कार्यकर्ताओं से मार खाते हैं, तो यही आंकड़ा आता है कि तीन साल में करीब छह हजार मारपीट। एक तरह से यह संतुलित आंकड़ा है, क्योंकि हमारे पास तीन साल पहले के आंकड़े नहीं हैं।
मगर यह अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है कि सत्ता में रहते हुए यह समझ आ जाती है कि कर्मचारियों को जब-तब पीट देने से पार्टी की छवि खराब होती है। सरकार के बाहर होने के बाद तो पार्टी की छवि ऐसे ही कर्मों से बनती है, मगर सरकार में यदि अपना दल है, तो आदत बदलनी पड़ती है।
सोचिए, अगर ये कर्मचारी न हों, तो पार्टी के कार्यकर्ता कहां जाकर ‘पराक्रम’ बताएं। इसलिए पार्टी हर बार रोजगार के नए-नए अवसर खोजने के लिए सरकार को कहती रहती है। कर्मचारियों की कमी नहीं पड़ना चाहिए, वरना डर रहता है कि एक ही कर्मचारी की दो-चार बार पिटाई हो जाती है। कमी है, तो उसका खामियाजा कार्यकर्ता तो नहीं भुगतने वाले।
पार्टी में होने का और भले ही कुछ लाभ न हो, यह तो है कि पुरानी हसरतें पूरी होती रहती हैं। जिस बलबूते पर पार्टी ने अंदर किया था, उसको बनाए रखना तो जरूरी है न! आज हैं सरकार में...कल नहीं होंगे, तो मारपीट करने वाले किराये पर लाएंगे? और फिर वे पार्टी में शामिल होने की मांग नहीं करेंगे, इसकी क्या गारंटी है?
कर्मचारियों पर यह आरोप लगता रहता है कि वे काम नहीं करते। यह क्या कम है कि वे पिटने के लिए नियत समय और स्थान पर उपलब्ध रहते हैं। बड़े अफसर यदि सुरक्षित हैं, तो इन्हीं कर्मचारियों की मुस्तैदी से। वरना पीटनेवाले को क्या पता कि वह जिसे पीट रहा है, वह एई है या ईई! जिन्हें पीटने से मतलब होता है, वे इस तरह की बारीकी में नहीं पड़ते।
किसी ने पूछा या नहीं, मगर सरकार की तरफ से बताया गया है कि पिटे भले ही छह हजार कर्मचारी हों, मगर किसी भी पीटनेवाले को सजा नहीं हुई है। साफ है कि ऐसे मामले कितने निरापद होते हैं, यदि अपने दल की सरकार हो। सरकारी कर्मचारी किसी के बाप के भी नहीं होते, इसलिए सरकारी दल उन्हें कभी अपना नहीं मानता। जानता है कि आज सत्ता बदल जाए, तो ये कल थाने जाकर दो की चार चोट दिखा आएं।
कर्मचारियों को पीटते रहने से इसका भी पता चलता है कि सत्ताधारी दल के लोग हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे हैं। विपक्षी दल भले ही इसे मुद्दा बनाएं कि कर्मचारी पिट रहे हैं, मगर सत्ताधारी दल तो खुश है कि कार्यकर्ता आज भी जोर-शोर से सक्रिय हैं!
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