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मुखौटा लगाइए और अन्ना बन जाइए

कविता भारत
Story Update : Tuesday, May 22, 2012    10:02 PM

यह ‘दाग अच्छे हैं’ का डिटर्जेंटी जमाना है। ऐसे-ऐसे उम्दा वाशिंग पाउडर बाजार में उपलब्ध हैं, जो गहरे-से-गहरे दाग तक को आनन-फानन में धो-पोंछ डालने की ताकत रखते हैं। हर राजनीतिक दल की गंगा जैसी अपनी-अपनी पावन नदियां हों, तो भला दाग टिकेंगे कैसे? इसलिए नेताओं और राजनीतिक दलों के दागों के खुलासे भी होते हैं और वे साफ भी कर दिए जाते हैं। एक से एक आरोप लगते हैं, और बाद में वे या तो फुस्स हो जाते हैं या उस दिशा में कोई जांच होती नहीं। आखिर जांच करेगा भी कौन? कोयले की दलाली में सबने अपने हाथ काले जो कर लिए हैं।

देखते-देखते अन्ना की असली लड़ाई कोने में जा ठिठकी। पर अन्ना तो अब बाजार का हिस्सा हैं। उनके नकली चेहरे दुकानों पर उपलब्ध हैं। सो अब अन्ना की जरूरत नहीं। अन्ना का मुखौटा लगाइए और अन्ना बन जाइए, हर्रे लगे न फिटकरी और रंग चोखा। यों ही हमारा देश वीर जवानों और अलबेलों-मस्तानों का नहीं है। हमने दूसरे देशों की सांविधानिक पोथियों से जोड़-तोड़ कर अपने लिए एक कामचलाऊ किताब का निर्माण कर लिया। पर ध्यान रखिए, अपनी संसदीय परंपराएं हमने वर्षों में खुद गढ़ी हैं, जिन पर हमें गर्व है। जैसे, संसद और विधानसभाओं के भीतर दर्शनीय हंगामे करने, जूते और माइक उछालने, कागज फाड़ने, गाली-गलौज करने, धमकियां देने, पोर्न फिल्में देखने, गंभीर बहसों के समय ऊंघने और खर्राटे भरने के मामलों में दुनिया भर में हमारा मुकाबला नहीं है।

हम मात्र लोकतांत्रिक ही नहीं, बल्कि गजब के अधिकार संपन्न देश भी हैं। यानी हमारे नागरिकों को स्वतः ही अनेक प्रकार के हक हासिल हैं, जो हमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में प्राप्त होते जा रहे हैं। हमारे पिता को भी अपने पिता से वे अधिकार प्राप्त थे और उनके पिता को अपने पिता से। पारिवारिक संपत्ति की मानिंद वे आगे भी हमारी संतानों को इसी तरह स्थानांतरित होते रहेंगे। जैसे दूल्हों को दहेज मांगने का जन्मसिद्ध अधिकार, यातायात नियमों को तोड़ने का अधिकार, घरों के आगे गलियों में खुलेआम कूड़ा डालने का अधिकार, सार्वजनिक जगहों पर अतिक्रमण करने और प्रत्येक समस्या के लिए सरकार और व्यवस्था को गरियाने का अधिकार, अपने नाजायज काम के लिए घूस देकर तंत्र को बेईमान कहने का अधिकार। हम इन अधिकारों को सहेज कर तो रखेंगे ही, अपनी पीढ़ियों को भी ये सब सौंप जाएंगे। आखिर हम लोकतांत्रिक परंपरा वाले मुल्क हैं।


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Bhuri singh, pune
jab ek chote se constable ko sena ya police mein bharti hone ke liye police station se charitra pramad patra lena hota yadi uske khilaf koi sangeen arop (hatya balatkar, ya marder) hota to uski ummidwari amanya ki jati hai jabaki wah chota sa sepahi sirf us kanoon ki rakha karne ka numayanda hota jabki jo log kanoon banate hain unki yogya ka koi mandand hi nahin hai hamare jo sansad hote hain unko tikit pahle party deti hai fir wo parcha bharte hain esase pahle unki police verification honi chahiye aur wahi log parcha bhar payen jo ek sepahi ke liye lagoo hai.
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