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साहित्य का वेटिंग रूम

रवींद्र त्रिपाठी
Story Update : Friday, March 09, 2012    11:36 PM

कई बार सोचता हूं कि क्या साहित्य का भी कोई 'वेटिंग रूम’ होता है। मतलब यह कि अगर जिंदगी के बारे में कहा जाता है कि वह एक सफर की तरह है, तो साहित्य भी एक यात्रा के समान है। आखिर आदमी छोटी उम्र से ही साहित्यकार बनने के सपने पालने लगता है, और जो सपने पालते हैं, उनमें से कुछ जल्द ही साहित्यकार का दरजा हासिल कर लेते हैं। जबकि कुछ ऐसे अभागे भी होते हैं, जो काफी कलम घसीटने के बावजूद अपनी छवि लेखक की नहीं बना पाते। फिर भी लगे रहते हैं। क्या इनके बारे में यह कहा जा सकता है कि वे लंबे समय तक साहित्य के वेटिंग रूम में बैठे रहते हैं?

साहित्य से लेकर दर्शन शास्त्र तक में किसी सवाल का सटीक जवाब नहीं होता। इसलिए कई लोग 'वेटिंग रूम’ वाली बात से सहमत नहीं होंगे, पर कई इससे सहमत होंगे। लंबा समय गुजारने के बाद भी जो साहित्यकार की कोटि में नाम दर्ज नहीं करा पाते, फिर भी कुछ न कुछ लिखते रहते हैं, वे तो यही सोचते होंगे कि कभी न कभी कोई गाड़ी आएगी और उन्हें गंतव्य तक पहुंचा देगी।

रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम की तरह साहित्य के वेटिंग रूम में भी कई किस्म के कवि-कहानीकार-नाटककार होते हैं। कई लोग लगातार पांडुलिपियां बनाते रहते हैं, प्रकाशक के पास जाते रहते हैं। प्रकाशक छापने के लिए तैयार नहीं होता, आश्वासन देता रहता है। लिखने वाले की पांडुलिपियों की संख्या बढ़ती जाती है, मगर विश्वास कायम रहता है कि कभी न कभी तो वह छपेगा। इसे आप क्या कहेंगे? इसके लिए 'वेटिंग रूम’ से बेहतर कोई उपमा है?

दरअसल एक अरसे तक साहित्य के साथ साधना शब्द जुड़ता था। कुछ लोग साहित्य- साधक होते थे। किंतु सबको साहित्य-साधक नहीं कहा जा सकता। साधक के बारे में यह माना जाता है कि उसका चित्त शांत होता है। लेकिन पुस्तक छपवाने की प्रतीक्षा में कई साल गुजार चुके लेखक या कवि से यह आशा करना कि वह चित्त को शांत किए रहे, वाजिब नहीं है। उसका चित्त तो अशांत होगा ही। ठीक उस यात्री की तरह, जो स्टेशन पर नियत समय पर पहुंचता है, पर उसकी ट्रेन देर पर देर होती है।

जैसे यात्री स्टेशन पर 'फलां ट्रेन साढे छह घंटे विलंब से चल रही है’ वाली उद्घोषणा सुनकर बेकरार होता रहता है, फिर अपने मन को ढाढस देने की कोशिश करता है, उसी तरह बरसों से बगल में अपनी पांडुलिपियां दबाए इस प्रकाशक से उस प्रकाशक तक दौड़नेवाला खुद को सिर्फ साहित्य साधक कैसे माने? वह तो तभी मानेगा न, जब उसकी दो-तीन किताबें छप जाएं और उसके मन में यह बात पैठ जाए कि दुनिया की नजरों में वह साहित्यकार है।

रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में हमेशा भीड़ बनी रहती है। गाड़ियां आती-जाती रहती हैं, मगर वेटिंग रूम में लोग बने रहते है। उसी तरह साहित्य के वेटिंग रूम में भी आवागमन जारी रहता है और लेखक बनने की महत्वाकांक्षा पालनेवाले बने रहते हैं। किताबें पहले से ज्यादा छप रही हैं।

प्रकाशनों की तादाद भी बढ़ रही है। खरीदारों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। परंतु साहित्य के वेटिंग रूम में भी भीड़ बढ़ रही है। कुछ लोग कुरसियों पर जमे हैं, तो कुछ दरी-चटाई लेकर आसन जमा चुके हैं। कुछ ने अखबारों को ही फैलाकर बैठने की जगह बना ली है। इन सबको इंतजार है कि साहित्य के राजधानी एक्सप्रेस में उनको जगह मिलकर रहेगी। भले साहित्य की गाड़ी विलंब से चले।


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