मेरे बापू बताते हैं कि उनके बापू के समय के अतिथि सुसंस्कृत होते थे। जितनी उनकी सेवा हो गई, उसे ही मेवा मान धन्य हो जाते थे। लेकिन उनके दौर के मेहमान उतने सुसंस्कृत नहीं रहे, पर सभ्य जरूर रहे। और मेरे वक्त में जबसे मेहमान मॉर्डन होकर गेस्ट हो गया है, मत पूछिए कि उनके आने पर घर में क्या-क्या नहीं होता! उनके पधारते ही पत्नी, बच्चे उनके जाने के बारे में मुझसे इशारों ही इशारों में पूछना शुरू करते हैं। हे गेस्ट, तुम सभ्य से भय क्यों हो गए?
आज बंदा चाहे ध्याड़ीदार हो, फड़ीवाला हो या गांव का हो या शहर का, वह मौत से इतना नहीं डरता, जितना घर में गेस्ट के आने से डरता है। मौत आए न आए, पर गेस्ट को तो आना ही होता है। हरेक गेस्ट को झेल चुका आज किसी रिश्तेदार या गैर रिश्तेदार गेस्ट से ऐसे डरता है, जैसे उसके घर में मौत से भी खतरनाक कोई चीज आ गई हो!
राम ही जाने, आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में ये गेस्ट आने के लिए वक्त कैसे निकाल लेते हैं! मौसम तक मेरे क्वार्टर का रास्ता भूल चुके हैं, पर पता नहीं, ये गेस्ट कैसे मेरे किराये के कमरे का रास्ता आंखें बंद कर भी पहचान लेते हैं। हे गेस्टो! खुद को भी भूलती जेनरेशन के दौर में आपकी स्मरण शक्ति को नमन।
बंदा सरकारी उपक्रम का हो या गैर सरकारी उपक्रम का, छोटा हो या बड़ा, वह हर तरह के गेस्ट के आने पर पहले खुद को कोसता है, फिर आने वाले को। क्या करे वह भी! उसकी भी तो मजबूरी है। दफ्तर में जाकर भले ही सारा दिन हीटर तापना हो, पर पहुंचना तो टाइम पर ही पड़ेगा न! अब तो सरकार ने कमबख्त हाजिरी की मशीनें लगाकर और भी परेशानी बढ़ा दी है।
सवा दस तक हर हाल में गिरते-पड़ते न पहुंचो, तो लग गई छुट्टी! पर गेस्ट को इससे क्या लेना-देना! ये गांव के पास के शहर में रहना भी किसी नरक में रहने से कम नहीं होता। कोई न कोई किसी न किसी बहाने गांव से मुंह उठाए चला ही रहता है। अटैंड न करो, तो गांव जाकर इतनी गालियां देंगे कि चार लोटे पानी पीने के बाद भी अगर कोई कह दे कि अब चुप हो जाओ, कौन-सा वह सुन रहा है, तब जाकर कहीं रुकें, तो रुकें।
हे मेरे गेस्टो! यह तो मुझे मालूम है कि आने से तुम रुकोगे नहीं, पर खुदा के लिए अब अचानक आना छोड़ दो! आपके अचानक आने पर बंदा इतना नर्वस हो जाता है, मानो उसकी मौत आ गई हो। आने से पहले अगर एक ठो फोन कर दो, तो मैं मन से न चाहते हुए भी आपको सहर्ष झेलने को तैयार रहूंगा।
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