संसद से सड़क तक की जानकारी देने वाले हिंदी कवि धूमिल की पहली कृति सड़क से संसद तक शीर्षासन की मुद्रा में है। सड़क से अन्ना और योगी बाबा एक पटकथा रचने की व्याकुलता लिए देश भ्रमण पर निकले हुए हैं। ये आम आदमी की समस्याओं को अपनी आवाज देते हुए कहते फिर रहे हैं कि राजकाज में भ्रष्टाचार का बोलबाला है, उसे मिटाना है, विदेशी बैंकों में जमा काला धन देश में लाना है। गोल भवन में कथित शताधिक दागी सदस्य बैठे हैं, उन्हें रिजेक्ट करना है।
जिज्ञासु आदमी टीवी में लोकसभा और राज्यसभा के चैनलों को ऑन कर देखता है, तो उसे सभी पुरुष सदस्य बगुले के पंखों जैसे उजले-झकास परिधानों में नजर आते हैं। उनके कपड़ों पर मक्खी जितना दाग भी दिखाई नहीं पड़ता। चांद में भले दाग दिखे, यहां तो 'दाग ढूंढते रह जाओगे' वाला चैलेंज दिया जा सकता है। फिर जंतर-मंतर तथा रामलीला ग्राउंड का सड़क छाप आदमी इन उजले सांसदों पर तोहमत क्यों लगाता है?
'नक्सलबाड़ी' के कवि धूमिल ने बीती सदी के सत्तर के दशक में बता दिया था, हर ईमान का एक चोर दरवाजा होता है, जो संडास की बगल में खुलता है। दुर्योग देखिए कि संसद के साठवें वर्ष के उत्सव के ठीक पहले राज्यसभा में सीवर ने लीक होकर ऐसी बदबू फैला दी कि सांसदों का बैठना मुश्किल हो गया और सदन की कार्यवाही रोक देनी पड़ी।
सड़क से जनतंत्र की दुहाई देने वाली और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लाभ उठाने वाली अन्ना-बाबाओं जैसी टीमें सचाई जानने और जनवाने को संघर्षरत है। पर उसी कवि का यह कहना अविश्वसनीय कैसे हो सकता है कि जनता क्या है...एक भेड़ है, जो दूसरों की ठंड के लिए, अपनी पीठ पर ऊन की फसल ढो रही है।
उधर सदन में भाषणवीरों की ध्वनियों का माप लें, तो दबंग वही साबित होता है, जिसकी आवाज बुलंद और भाषा लट्ठमार हो। कहां माननीय लालू जी के मृदंग और कहां प्रधानमंत्री की महीन तूती! और उधर माननीय पीठासीन स्पीकर महोदय की प्लीज-प्लीज...बैठ जाइए-बैठ जाइए जैसी कोकिलकंठी अपील की तो तुलना ही नहीं हो सकती।
माननीय सभासद हमेशा तो सांसद या जनप्रतिनिधि नहीं होते। शेष जीवन में वे जन ही रहते हैं। भाषा को लेकर ऐसे में फिर कवि धूमिल की पंक्ति कौंधती है- भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है, जो सड़क पर और है, संसद में और है।
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