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ए भाई, जरा देख के चलो

श्याम विमल
Story Update : Monday, February 06, 2012    12:30 AM

देश में रोज दुघर्टनाओं की खबरें आती हैं। कभी कोहरे में कई गाड़ियां टकरा जाती हैं, तो कभी तेज रफ्तार कार टकराकर सैकड़ों फुट नीचे गिर जाती है। कभी ईयरफोन लगाकर गाना सुनते दीन-दुनिया से बेखबर युवा अचानक ही काल के गाल में समा जाते हैं। फिर भी लोग सजग नहीं होते।

राज कपूर की जोकर फिल्म का गाना याद आ रहा है, ए भाई, जरा देख के चलो। इसमें दाएं-बाएं, आगे-पीछे ही नहीं, ऊपर और नीचे भी देखकर चलने की हिदायत दी गई है। उस हिदायत से संदेश यह मिला कि पैदल चलने वाले ही जिम्मेदारी संभालें अपनी जान बचाने की। वैसे भी फॉरमूला-वन रेस देखकर प्रेरित युवावर्ग अपनी बाइकों और कारों की रफ्तार बढ़ाने में 'हम किसी से कम नहीं' वाला इरादा रखते हैं। ऐसे में संभलना तो आखिरकार पैदल चलने वालों को ही है, और हर हादसे के बाद पछताना भी उसी को है।

बाइक सवार की तो बात ही अलग है। अपनी मोटर बाइक का पहिया इस अदा से उठाकर कि मेरी नाक ऊंची है अथवा गाड़ी पर लेटकर दौड़ते-दौड़ते सर्कस दिखाने की तमन्ना उसे पूरी करनी है। भले इस अदा में वह डिवाइडर से या पटरी से टकराकर मरे या राहगीर से, अपनी बला से, उसे तो रोमांचित रहने में ही सुपर मजा है।

करेला और नीम चढ़ा वाला मुहावरा ऐसे बाइक सवारों के लिए तब फिट बैठता है, जब वह ह्विस्की के चार-पांच पैग हलक में उतारे हो और पिछली सीट पर बिठा रखी गर्लफ्रेंड की गलबहियों बीच किलकार रहा हो- आज मैं ऊपर आसमां नीचे वाले अंदाज में। आखिर महंगी बाइक हो या कार, है तो उसके नीचे ही न, जिसे उसके बाप-दादाओं ने अपनी जमीन सरकारी प्राधिकरणों को बेचकर मुआवजे में प्राप्त लाखों रुपयों में अपने और बेटों की अय्याशी और अरमानों की पूर्ति के वास्ते खरीदा है।

मुआवजे में धनबल वाली अमीरी पाए, अपने लग्जरी वाहनों के हॉर्न की निरंतरता से राह चलते को चमकाते हुए ये नासमझ अमीरजादे अपनी ऊपरी पहचान क्यों न जताएं कि सड़क पर आगे-पीछे देखना तो पैदल सवार को ही है। बाइक पर सवार ये लोग तो यह जानकर गतिमान हैं कि जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना?

ऐसे आधुनिकोत्तर विचार दर्शन के अनुगामी को तो नेशनल हाइवे रेस का मैदान लगता है और ऊंची रफ्तार भौतिक प्रगति। मॉर्निंग वॉक करता पैदल यात्री कोहरे की धुंध में उसे धुंधला धब्बा लगता होगा या सड़क पार करता कोई आवारा पशु!


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