| कथा / लघुकथा |
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प्यार और आदर्श
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| महीने भर की दुविधा के बाद मैंने अपने दोस्त से पूछ ही लिया, प्रेम विवाह के बारे में तुम्हारी क्या राय है?
एक दम गंभीर होकर उसने मुझे दो पल के लिए निहारा और एक दार्शनिक मुद्रा मे .... |
किताबों के सहारे कट गए पंद्रह साल |
अंगूठी |
चोर |
ईसा की वापसी |
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| कविता |
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चिट्ठी
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कुछ कहीं लगती नहीं संभावनाएं गांव चिट्ठी शहर को लिखने लगे।
राजपथ क .... |
एक लौ बची रहेगी |
साबूदाने के वड़े |
सांकल |
उसका आना |
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| किताब |
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प्रेम को अभिव्यक्त करने की चुनौती
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| हिंदी उपन्यास के वर्तमान पर विचार करें, तो इसकी कई धाराएं दिखाई देती हैं। एक तरफ नए मुद्दों और निषिद्ध प्रदेशों की यात्रा करती स्थापित उपन्यासकारों की रचनाएं हैं, दूसरी ओर नवोदित र .... |
मामूली लोगों की बड़ी कहानियां |
प्रकृति, प्रेम और वात्सल्य के अनूठे रंग |
शिव आराधना और दर्शन पर जरूरी शास्त्र |
तीन शिखर लेखिकाओं के बारे में |
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| कला |
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 | कविता, गीत और संगीत
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| सवाल यह है कि क्या इस मौके पर कविता से संबंधित दूसरी जरूरी चर्चाएं भी हो रही हैं? आज कविता के लिए समाज में कितनी जगह रह गई है? जो जगह है भी, वो कैसी कविता के लिए है? कविता और गीत .... |
साहित्य में शोर |
बेचारी विधाएं |
पॉजिटिव ड्रग है संगीत |
मैत्री के लिए कला प्रदर्शनी |
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| व्यंग्य |
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नेता की भाषा पर मत जाइए
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| वैसे तो नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वे कब कौन-सी भाषा बोलने लगें, कुछ पता नहीं। अब देखिए, बिहार के शतवर्षीय होने का फायदा यह हुआ कि नीतीश जी मराठी बोलने लगे। सूट-बूटवाला अंगर .... |
साहित्य से पान की बेदखली |
हंसी भी एक रंग है रंग है तो भंग है ! |
वसंत में चिकनी चमेली |
अपने (बद) रंग हजार! |
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| शेष - विशेष |
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हिंदी की जातीय परंपरा से कटे हुए हैं बुद्धिजीवी
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| विष्णुचंद्र शर्मा हिंदी की स्वाभिमानी परंपरा के लेखक हैं। बरसों से दिल्ली में रहते हैं पर अपने बनारस और बनारसी अंदाज को अभी तक नहीं भूल पाए हैं। लाभ-हानि का गणित देखकर ही बोलने के .... |
होलिका पूजन |
किताबें पढ़ते हुए कितनी ही बार रोया हूं मैं ! |
चुनावी हल्ले में लेखक का भला क्या काम ! |
खामोशी के शायर की विदाई |
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