इसमें कोई शक नहीं कि फिल्म बनाने के लिए इस समय करप्शन सबसे हॉट विषय है, लेकिन बात अच्छी पटकथा और उसके निर्वहन पर अटक जाती है। फिल्म गली गली चोर है की कहानी सम सामयिक है, परंतु इसमें ठूंसा गया अतिरिक्त हास्य दिक्कत पैदा कर देता है। समझ में नहीं आता कि यह फिल्म विशुद्ध रूप से हंसाने के लिए बनाई गई है या भ्रष्टाचार की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए। अगर पटकथा तार्किक बनाई जाती, तो निश्चित रूप से यह फिल्म ज्यादा असर करती।
भारत नाम के एक बैंक कैशियर को केंद्र में रखकर बुनी गई इस फिल्म में नेताओं और पुलिस तंत्र का गठबंधन दिखाया गया है। साथ ही यह भी बताने की कोशिश की गई है कि आज का सिस्टम कैसे आम आदमी को भ्रष्ट बन जाने पर मजबूर करता है। लेकिन लचर कहानी और बेतरतीब पटकथा के कारण यह पीपली लाइव, वेलडन अब्बा और खोसला का घोंसला जैसी भ्रष्टाचार को केंद्र में रखकर बनाई गई फिल्मों के करीब नहीं पहुंच पाती है। गली गली में चोर है में ऐसे दृश्यों की संख्या ज्यादा है, जो बेवजह ठुंसे हुए प्रतीत होते हैं।
इस फिल्म में एक नेता को मारे गए थप्पड़ वाले सीन की बड़ी चर्चा थी, लेकिन परदे पर इसका कोई प्रभाव नजर नहीं आता है। पिछले दिनों अन्ना हजारे को उनके गांव रालेगण सिद्धि जाकर यह फिल्म दिखाई गई थी, जिसकी वजह से इसे थोड़ी बहुत चर्चा जरूर मिली है। काश, यह अन्ना के भ्रष्टाचार मिटाओ अभियान को आगे ले जाने में मदद कर पाती!! अभिनय की बात करें, तो अक्षय खन्ना, सतीश कौशिक, श्रेया सरन और मुग्धा गोडसे औसत हैं। विजय राज और अन्नू कपूर का काम जरूर ध्यान खींचता है। पाकिस्तानी अभिनेत्री वीना मलिक का आइटम बेअसर है। हां, कैलाश खेर छा गए हैं। उनका टाइटल सांग अपील करता है।
हरि मृदुल
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