कई बार टाइम शेयर कंपनियां अपनी सेवाओं की मार्केटिंग के समय बहुत सारी सुविधाओं के वायदे करती हैं, लेकिन जब इन सेवाओं को उपलब्ध कराने की बारी आती है तो वह इससे मुकर जाती हैं। प्राय: ऐसे मामलों में उपभोक्ता को उपभोक्ता अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। ऐसी कंपनियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार सख्ती दिखाई है। कई बार ये कंपनियां शीर्ष उपभोक्ता अदालत की नोटिस को भी अनसुना कर देती हैं। आरसीआई इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम पार्थसारथी व अन्य (आरपी सं. 444, 2007, निर्णय- 11 जनवरी 2012) के मामले में उपभोक्ता कोर्ट का फैसला ऐसी कंपनियों के लिए एक सबक है।
दंपति ने आरसीआई इंडिया को नोटिस भेजा
सिकंदराबाद के मिस्टर और मिसेज पार्थसारथी को आरसीआई इंडिया द्वारा गेमावत रिजॉर्ट के ‘द विलेज’ नामक जगह पर छुट्टी बिताने का आमंत्रण आया। बेहतर सेवा और किफायती दाम के वादे पर यकीन करते हुए पार्थसारथी दंपति ने द विलेज में स्टूडियो अपार्टमेंट बुक कराया। पार्थसारथी दंपति जब वहां पहुंचे तो उन्होंने पाया कि कंपनी ने वादे के अनुरूप सुविधाएं नहीं उपलब्ध कराई हैं। बाद में जब दंपति ने आरसीआई इंडिया को नोटिस भेजा तो उसने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि उसका और गेमावत रिजॉर्ट का व्यावसायिक संबंध खत्म हो गया है।
1,000 रुपये अदालती खर्च का भुगतान
जिला उपभोक्ता अदालत ने आरसीआई की इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस धोखाधड़ी में आरसीआई इंडिया और गेमावत रिजॉर्ट दोनों को कसूरवार माना और कहा कि भले ही गेमावत रिजॉर्ट ने पार्थसारथी दंपति से पैसे वसूले, लेकिन उसका कमीशन आरसीआई को भी मिला है। अदालत ने पार्थसारथी दंपति द्वारा दिए गए 1,15,175 रुपये नौ फीसदी ब्याज के साथ अदा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने 10,000 रुपये मुआवजा और 1,000 रुपये अदालती खर्च का भुगतान भी करने के आदेश दिए। इस मामले में दोनों कंपनियों की पुनरीक्षण याचिका राज्य और शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने भी खारिज कर दी।
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