सेलरी सेविंग योजना के तहत ऐसे कई मामले हैं, जिनमें कर्मचारी या उनके नामिनी को नियोक्ता की लापरवाही के कारण ग्रुप इंश्योरेंस के लाभ से वंचित होना पड़ा है। अधिकांश ऐसे मामले हैं, जिनमें नियोक्ता द्वारा कर्मचारी के वेतन से काटी गई प्रीमियम की राशि समय पर बीमा कंपनी के यहां जमा नहीं कराई गई, जिस कारण क्लेम के समय कर्मचारी या उसके नामिनी को काफी मुश्किलों से दो-चार होना पड़ा। अधिकांश मामलों में कर्मियों की विधवाओं को न्याय के लिए कोर्ट की शरण में जाना पड़ा।
विद्यार्थी को बीमे की सुविधा मिल जाएगी
ऐसे ही एक मामले ‘नेशनल इंश्योरेंस बनाम डीएबी पीजी कॉलेज और शरीफ अहमद’(आरपी नं. 2095, फैसला 10 जनवरी 2012) में लाभार्थी को c। इस मामले में शीर्ष उपभोक्ता अदालत का फैसला बीमा कंपनियों के लिए एक सबक है। प्रकरण अनुसार, कॉलेज के विद्यार्थियों द्वारा एक कल्याण बीमा लिया गया, जिसमें स्वास्थ्य और दुर्घटना की सहूलियत शामिल थी। योजना के अनुसार, दाखिले के समय प्रत्येक छात्र 22 रुपये सालाना प्रीमियम फीस के साथ जमा कराएंगे। सभी कॉलेज यह राशि नेशनल इंश्योरेंस कंपनी में जमा कराएंगे और इस प्रकार हर विद्यार्थी को बीमे की सुविधा मिल जाएगी।
पहले बीमे का प्रीमियम नहीं भरा
अगस्त 1999 में जब शरीफ अहमद ने डीएवी पीजी कॉलेज में दाखिला लिया, तो योजना के मुताबिक उसने फीस के साथ ही बीमे की प्रीमियम राशि भी जमा कर दी। उसी साल दिसंबर से सड़क हादसे में उसकी मौत हो गई। शरीफ के माता पिता ने जब बीमा कंपनी से क्लेम किया, तो बीमा कंपनी इससे मुकर गई। कंपनी का कहना था कि कॉलेज ने शरीफ की मौत से पहले बीमे का प्रीमियम नहीं भरा था। शरीफ के पिता ने जिला उपभोक्ता अदालत में कॉलेज के खिलाफ एक अर्जी दाखिल की।
शीर्ष उपभोक्ता अदालत में याचिका दायर की
जिला फोरम ने कॉलेज को बीमे की राशि शरीफ के पिता को देने का आदेश दिया। राज्य उपभोक्ता अदालत ने बीमा कंपनी को दोषी माना और शरीफ के पिता को 1,10,000 रुपये बीमा राशि आठ फीसदी मय ब्याज देने का आदेश दिया। बीमा कंपनी ने शीर्ष उपभोक्ता अदालत में याचिका दायर की। दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने कहा कि बीमा कंपनी अपने दायित्वों का निर्वहन करने में नाकाम रही। शीर्ष अदालत ने राज्य फोरम के फैसले को बरकरार रखा।
0
खबर पर अपनी राय दें