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कटान रोकने की योजना पड़ी ठंडे बस्ते में

Bhadohi

Updated Tue, 15 May 2012 12:00 PM IST
सीतामढ़ी। गंगा कटान की त्रासदी झेल रहे कोनिया के किसानों की समस्याएं निकट भविष्य में कम होती नहीं दिख रही हैं। गंगा कटान के स्थायी निदान के आसार भी फिलहाल कम ही दिख रहे हैं। कटान रोकने के लिए 18 करोड़ की परियोजना ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
तीन ओर से गंगा नदी से घिरे जनपद के कोनिया क्षेत्र में गंगा कटान सबसे बड़ी समस्या का रूप ले रही है। जनपद मुख्यालय का दक्षिणांचल क्षेत्र यूं तो समस्याओं के लिए जाना जाता है, लेकिन पिछले तीन दशक से पतित पावनी भी नाराज चल रही हैं। इसके चलते गंगा की धारा ने सबसे पहले हरिहरपुर गांव का अस्तित्व मिटाया। अब इस गांव पर नदी की धारा बहती है। वर्तमान में छेछुआ और भुर्रा गांव के किसान कटान की त्रासदी झेल रहे हैं। दोनों गांवों के किसानों की लगभग दो सौ बीघे उपजाऊ भूमि कटान की भेंट चढ़ गई। अब उन जमीनों पर गंगा की धारा बहती है। क्षेत्र के इटहरा, गजाधरपुर, डीघ, मवैयाथान सिंह, कलिक मवैया, बसगोती मवैया, बनकट, नारेपार, बारीपुर आदि गांवों में भी आंशिक कटान शुरू है। बरसात के दिनों में गंगा का जलस्तर बढ़ते ही कटान शुरू हो जाता है और किसानों की बर्बादी शुरू हो जाती है। मुख्य रूप से छेछुआ और भुर्रा में कटान किसानों को बर्बादी की ओर धकेल रही है। कटान रोकने के लिए काफी हो हल्ला मचा तो बात प्रशासन और शासन तक पहुंची, कार्रवाई के लिए किसानों को आश्वासनों की घुट्टी पिलाई जाने लगी लेकिन यथार्थ में सामने कुछ भी नहीं दिखा। तीन साल पूर्व कटान रोकने के लिए कवायद शुरू हुई। गंगा फ्लड कंट्रोल कमेटी (जीएफसीसी) की टीम ने दोनों गांवों में सर्वे किया तथा कटान रोकने के लिए बंधी डिविजन वाराणसी के इंजीनियरों ने 2750 मीटर की लूप परियोजना तैयार की थी। इसमें कटान रोकने के लिए नदी में बोल्डर पिचिंग तथा ऐप्रेन बनाने के लिए 18 करोड़ की परियोजना तैयार की गई थी। ज्ञानपुर पंप नहर परियोेजना के अधिशासी अभियंता सिविल एके शर्मा ने बताया कि परियोजना को जीएफसीसी की संस्तुति पर मुख्य अभियंता बाढ़ नियंत्रण लखनऊ को भेजी गई, जिसे बाढ़ नियंत्रण ने पास कर टेक्निकल एडवाइजरी कमेटी (टीएसी) को भेजा, जिसे कमेटी ने कैंसिल कर दिया। इस तरह कटान रोकने की सारी कवायद पर पानी फिर गया।
गंगा कटान से भदोही का रकबा हो रहा कम
सीतामढ़ी। गंगा की धारा में बदलाव किसी को बर्बाद तो किसी को आबाद भी कर रही है। इस ओर धारा में परिवर्तन होता है वहां तो कटान शुरू हो जाता है और तटीय किसानों की उपजाऊ जमीन नदी की भेंट चढ़ती जाती है। इससे किसान बर्बाद होने लगता है। इंच-इंच जमीन के लिए परेशान किसान अपनी बर्बादी पर आंसू बहाने के सिवा कुछ नहीं कर सकता। दूसरी ओर गौर करें तो नदी की धारा में परिवर्तन से नदी पार की जमीन बढ़ने लगती है। क्योंकि धारा कटान वाले क्षेत्र में बहने लगती है। इस लिहाज से देखा जाए तो भदोही जनपद का रकबा तो घट रहा है, लेकिन गंगा पार इलाहाबाद और मिर्जापुर जनपद के किसानों का रकबा बढ़ रहा है। क्षेत्रीय किसानों के मुताबिक उनकी तीन सौ बीघा जमीनों पर गंगा की धारा बह रही है।

अब 25 से 30 करोड़ की पड़ेगी जरूरत
सीतामढ़ी। कोनिया को कटान की विभीषिका से बचाने के लिए अब कम से कम 25 से 30 करोड़ की परियोजना की आवश्यकता पड़ेगी। क्योंकि बंधी विभाग ने जो तीन वर्ष पूर्व 18 करोड़ की जरूरत बताई थी, उसमें अब महंगाई की मार से परियोजना का खर्च काफी बढ़ जाएगा। परियोजना के ठंडे बस्ते में चले जाने से हालात अब काफी परिवर्तित हो चुके हैं। कटान से बचाने के लिए नई परियोजना के लिए खर्च का समायोजन करना किसी चुनौती से कम नहीं होगी।

टीएसी ने क्यों कैंसिल की परियोजना
सीतामढ़ी। कटान रोकने के लिए तैयार की गई 18 करोड़ की परियोजना को टैक्निकल एडवाइजरी कमेटी ने तत्कालीन शासनादेश का हवाला देते हुए खारिज किया था। अधिशासी अभियंता एके शर्मा ने बताया कि कमेटी के अनुसार बड़े शहर, बड़े नगर को कटान से बचाने के लिए यह योजना है। लेकिन यदि गांव और बस्तियां कटान की जद में आती हैं तो ऐसी बस्तियों को अन्यत्र शिफ्ट करने की योजना है। यही हवाला देकर योजना कैंसिल हो गई।
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