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खेत की जुताई से नमी का संरक्षण

Bhadohi

Updated Wed, 02 May 2012 12:00 PM IST
ऊंज। रबी की फसल कटने के बाद खेतों की जुताई मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए सर्वोत्तम है। कटाई के बाद तुरंत जुताई करने से बड़ा लाभ यह होता है कि उस समय खेत में नमी रहने के कारण जुताई करने में सुविधा होती है। इससे मिट्टी के अंदर सूर्य की रोशनी और हवा प्रवेश करती है। सूर्य की तेज किरणों से मृदा के अंदर खरपतवार के बीच और कीट, अंडा, लटें आदि नष्ट हो जाती हैं।
यह बातें कृषि ज्ञान केंद्र ऊंज में आयोजित गोष्ठी में विषय वस्तु विशेषज्ञ डा. मदनसेन सिंह ने कहीं। उन्होंने कहा कि गर्मी की जुताई से भूमि के अंदर नमी का संरक्षण होता है। मृदाजन्य रोगों के नियंत्रण में गर्मी की जुताई से पिछली फसल के रोग ग्रसित भाग जो मृदा में मिल गए वे सूर्य की तेज किरणों से नष्ट हो जाते हैं। बहुत से कीट टिड्डी, अपने अंडे मिट्टी में कुछ सेमी भीतर रख देते हैं। यदि ग्रीष्मकालीन में जुताई की जाए तो ये सब सतह पर आ जाते हैं और पक्षियों द्वारा नष्ट कर दिए जाते हैं। ग्रीष्मकालीन जुताई से बहुवर्षीय खरपतवारों की जड़ें बाहर आकर नष्ट हो जाती हैं। दो से तीन बार गहरी जुताई करके कांस व दूब जैसे खरपतवारों से मुक्ति पाई जा सकती है। जुताई के बाद भूमि की सतह खुलकर वायु का सचार प्रचुर मात्रा में होता है। इससे मृदा में नाइट्रोजन तेजी से बनता है व जैवीय पदार्थ नाइट्रेट में बदल जाते हैं। गर्मियों की जुताई से जीवांश पदार्थ (रबी फसलों के अवशेष) धूल के कण आदि मृदा में मिलकर खरीफ फसल की बुआई के समय आधार खाद के रूप में फास्फोरस व पोटाश की उपलब्धता के बढ़ाते हैं। डा. सिंह ने कहा कि यदि खेत ढलान पूर्व से पश्चिम की ओर हो तो जुताई उत्तर से दक्षिण की ओर करनी चाहिए। यदि भूमि ऊंची नीची है तो उसे इस प्रकार जोतना चाहिए कि मिट्टी का बहाव न हो यानी ढाल के विपरीत दिशा में जुताई करें। यदि एकदम ढलान है तो टेढ़ी जुताई करना उपयुक्त होगा। तवेदार हल से जुताई करने पर फसल के डंठल कटकर छोटे हो जाते हैं और साथ ही साथ भूमि में जीवांश की मात्रा को बढ़ाते हैं। बताया कि अनेक कीट, पतंगे या इनके प्यूपा, लारवा, अंडे जमीन की सतह पर आ जाने से नष्ट हो जाते हैं। फसलों के हानिकारक रोगाणु, फफूंदी आदि जो मृदा में फसल अवशेषों को पनपते रहते हैं। इस मौके पर अनेक किसान मौजूद थे।
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