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कोशिश संगीत की पुश्तैनी रवायत जिंदा रखने की

Badaun

Updated Fri, 12 Oct 2012 12:00 PM IST
बदायूं। तुमको ऐ वीरानियो शायद नहीं मालूम है,
हम बनाएंगे इसी सहरा को बस्ती एक दिन।
मुनव्वर राना का यह शेर उन लोगों के लिए उदाहरण है जो किसी न किसी क्षेत्र में बुलंदी के झंडे गाड़ने के लिए बराबर संघर्ष कर रहे हैं। संघर्षों की इस कड़ी में दो शख्स ऐसे भी हैं जो ऐसे घराने को ऊर्जा देने का काम कर रहे हैं जो बाजारवाद की भीड़ में गुम हो चुका है। यह घराना है नामी-गिरामी ‘सहसवान-रामपुर-ग्वालियर घराना’। शायद कुछ लोगों को पता हो कि संगीत के क्षेत्र में भारत का पहला पदमभूषण इसी घराने के उस्ताद मुश्ताक हुसैन खां को मिला। संगीत की इसी पुश्तैनी रवायत को आगे बढ़ा रहे हैं घराने के चश्मो चिराग मुजतबा हसन और उनके भाई शाजेब। सितारवादन के क्षेत्र में उनकी तमन्ना आसमान छू लेने की है लेकिन एक टीस भी कि संगीत एवं साहित्य की उद्गम भूमि (बदायूं) पर ही संगीत साधना को ज्यादा तवज्जो नहीं मिली।
रवींद्रालय, लखनऊ में सितार ध्रुव की उपाधि से नवाजे जा चुके 31 वर्षीय मुजतबा ने 16 साल तक अपने वालिद उस्ताद इफ्तिखार हुसैन खान से संगीत के गुर सीखे। फिर दिल्ली में उस्ताद जफर अहमद खां से वादन की बाकायदा तालीम ली। विराट नगर (नेपाल) में इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स (आईएफए) से जुड़े और धूम मचाई। कच्छ (गुजरात) के भूकंप पीड़ितों की सहायतार्थ परंपरा संस्था द्वारा बदायूं महोत्सव -2001 में उन्होंने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। उनकी उंगलियों का जादू मुल्क से बाहर भी बिखरा। नेपाल, इजिप्ट (मिस्र) चीन आदि देशों में भारतीय शास्त्रीय संगीत को उन्होंने स्थापित किया है। ईरान-इंडिया वीक में भी वह शामिल रहे। वर्तमान में वह अपने पिता द्वारा स्थापित संस्था परंपरा पद्म भूषण उस्ताद निसार हुसैन खां संगीत समिति में सचिव पद पर रहते हुए शास्त्रीय संगीत को आगे बढ़ा रहे हैं। वहीं 29 वर्षीय शाजेब भी अपने भाई के नक्शेकदम पर हैं। उनकी तमन्ना बदायूं में संगीत आश्रम बनाने की है।
इन दोनों भाइयों को संगीत के हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में मिला। इस विरासत की जड़ संगीत सम्राट तानसेन तक जुड़ती है। तानसेन के वंशज उस्ताद बहादुर हुसैन खां (ग्वालियर घराना) की पुत्री सहसवान घराने के आदि गुरु के रूप में प्रसिद्ध रहे उस्ताद इनायत हुसैन खां से ब्याही गई थीं। उस्ताद इनायत हुसैन खां सवा सौ साल पहले तीन दशक तक नेपाल के राजगायक रहे। संगीत के क्षेत्र में भारत का पहला पद्मभूषण प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में घराने के उस्ताद मुश्ताक हुसैन खां को मिला। वह रिश्ते में मुजतबा और शाजेब के दादा थे। देश-विदेश में शास्त्रीय गायिकी में नाम कमा चुके उस्ताद निसार हुसैन खां (सगे दादा) को पद्म भूषण और गुलाम मुस्तफा खान (ताऊ) व उस्ताद हफीज अहमद खां (फूफा) को पद्मश्री जैसे पुरस्कार मिल चुके हैं। सहसवान-रामपुर घराने के ही उस्ताद पद्मश्री राशिद खान (भाई) और उस्ताद इफ्तिखार हुसैन खां (पिता) भी शास्त्रीय संगीत की लगातार साधना में जुटे हुए हैं। इफ्तिखार साहब को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली में उस्ताद निसार हुसैन खां संगीत नाइट-2001 और उप्र. संगीत नाटक एकेडमी की लखनऊ में आयोजित शाम ए अवध 2003 में मुख्य कलाकार के रूप में मौका मिल चुका है।


ये हैं घराने की विशेषताएं
यह घराना मूलत: ख्याल घराना है। टप्पा तान इस घराने की मौलिकता है। शास्त्रीय रागों में गौर मल्हार, भैरव, झिझोटी, जैजैवन्ती, गौड़ सारंग, सूहा काफी, विहाग, केदार आदि प्रसिद्ध हैं।
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