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चकाचौंध में गुम हुई पेड़ा की मिठास

Badaun

Updated Sat, 06 Oct 2012 12:00 PM IST
बदायूं। रुहेलखंड और आसपास के जिलों में बदायूं की पहचान बना यहां का पेड़ा अपनी मिठास खोता जा रहा है। भले ही वर्तमान में पेड़े के कारोबारी बढ़ गए हों लेकिन इसको पसंद करने वालों में लगातार कमी आ रही हैै।
बदायूं के पेड़े का नाम केवल बदायूं ही नहीं, आसपास के जिलों में भी जाना जाता है। बदायूं में पेड़ा बनाने की शुरुआत मम्मन खां ने वर्ष 1825 में की थी। मम्मन खां तो अब नहीं रहे, लेकिन उनकी चौथी पीढ़ी आज भी बुजुर्गों से धरोहर के रूप में मिली इस कला को आगे बढ़ा रही है। मम्मन खां की चौथी पीढ़ी के फिरासत अली खां बताते हैं कि रुहेलखंड पर जब अंग्रेजों का हमला हुआ तो यहां के नवाब हाफिज अहमद खां ने अफगानिस्तान के सुल्तान से मदद मांगी। अफगानिस्तान की फौज केे साथ मम्मन खां के पिता जान मोहम्मद खां यहां आए थे। जान मोहम्मद अफगानिस्तान की फौज में सिपहसालार थे।
अंग्रेजों सेे लड़ाई में नबाब हाफिज अहमद खां के मारे जाने के बाद फौैज तितर बितर हो गई और मम्मन खां पकड़ लिए गए। उन्हें सौ कोड़ों की सजा भी हुई। जिसके निशान ता उम्र उनके जिस्म पर रहे। अंग्रेजों की कैद से छूटने के बाद मम्मन खां एक फकीर के संपर्क में आए और फकीर बनकर यहीं रहने लगे। उस फकीर से ही उन्होंने पेड़ा बनाने की कला सीखी और इसी से अपना गुजर बसर करने लगे। फिरासत अली बताते हैं कि पहले मिट्टी की हांडियों में पेड़ा बेचा जाता था। उस समय पेड़ा के चाहनेे वाले भी ज्यादा थे।
उन्होंने बताया आजादी के साथ हुए देश के बंटवारे में बहुत से लोग पाकिस्तान चले गए। लेकिन मम्मन खां का परिवार यहीं रहा और आज उनकी चौथी पीढ़ी पुरखों से मिली कला कोे आगेे बढ़ा रही है। बरेली और आसपास केे जिलों में भी बदायूं के पेड़े के नाम से पेड़े का कई लोग कारोबार कर रहे हैं।

रजी चौक पर पेड़ा का कारोबार करने वाले ओमकार बताते हैं कि करीब दस साल सेे वह पेड़ा का कारोबार कर रहे हैं। तब पेड़ा 50 रुपये प्रति किलो बिकता था आज इसकी कीमत में तीन गुना बढ़ोत्तरी हो चुकी है। लोग अब दूसरी मिठाइयों को ज्यादा पसंद करने लगे हैं। हालांकि पुराने लोग आज भी पेड़ा को ही पसंद करते हैं।
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