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टूटते परिवार, बुढ़ापे को चाहिए लाठी

Badaun

Updated Mon, 01 Oct 2012 12:00 PM IST
बदायूं। यह कोई नई बात नहीं है, बचपन में दादा को देखा, बाद में पिता और अब खुद बुढ़ापे की डगर पर चल रहे हैं। देश को आजादी तो मिल गई लेकिन हम लोग अभी भी उपेक्षा की नजर से देखे जाते हैं। सरकारें बदलीं, निजाम भी बदले लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि इस उम्र में हम लोगों के अपने साथ छोड़ दें तो कहां ठौर होगा। इसी का नतीजा है कि आज हम लोग एक साथ बैठकर अपनी परेशानियों पर मशविरा कर सकें, इसके लिए एक अदद वृद्ध आश्रम भी नहीं बनाया गया है। ये शब्द उम्र के 82 बसंत देख चुके रामकुमार के हैं। वह सरकारी मशीनरी से बेहद त्रस्त हैं। उन्हें यह नहीं पता कि वृद्ध दिवस नाम का कोई दिन इस देश में मनाया जाता है।
भले ही हम 21वीं सदी में रफ्तार से विकास की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन अपने घर और समाज के बुजुर्गों के लिए न तो शासन प्रशासन ने कुछ साकारात्मक किया और न ही समाजसेवा का डंका पीटने वालों ने।
महज 59 हजार को पेंशन
समाज कल्याण विभाग जिले के महज 59 हजार 13 बुजुर्गों को वृद्धावस्था पेंशन दे रहा है। जबकि जिले में हजारों ऐसे वृद्ध हैं जो पेंशन के लिए विभाग केचक्कर लगा रहे हैं। इनमें रामबहादुर और रामकुमार भी शामिल हैं।
रोशनी की सिर्फ एक किरण
वक्त के मारे बुजुर्गों को जिले में महज एक जगह रोशनी की किरण दिखती है। जगह है दातागंज क्षेत्र के गांव नेता झुकसा का वृद्ध सेवा आश्रम। चेयरमैन राजीव गुप्ता और ओमप्रकाश गुप्ता समेत दर्जनभर लोग इस आश्रम की व्यवस्था देख रहे हैं। वर्तमान में यहां 11 ऐसे बुजुर्ग हैं, जो लावारिस हैं। यहां इनके रहने के लिए बड़ी जगह और मनोरंजन के लिए टीवी भी लगा है। बिजली न आने पर सोलर लाइटों की जगमगाहट में ये बुुजुर्ग जिंदगी के बीते पलों को याद करते हैं।
सबक के बदले सुविधा नहीं
82 का आंकड़ा पार कर चुके रामबहादुर का कहना है कि इतिहास से सबक तो सभी ले लेते हैं। इसकी मिसालें भी दी जाती हैं, लेकिन इतिहास में दर्ज होने जा रहे हम लोगों को सुविधा के नाम पर कुछ नहीं मिलता।


उम्र बीत गई नहीं मिले दो पल
71 साल के रामकुमार अभी भी एक मैरिज लॉन में नौकरी करते हैं। बोले परिवार की जिम्मेदारी का बोझ संभालते उम्र बीत गई लेकिन हमउम्र लोगों के साथ बैठकर अपना दर्द बयां करने का समय नहीं मिला।

शुरू करेंगे एकाकी प्रयास
संस्कृति प्रधान देश में बुजुर्गों की उपेक्षा को सांस्कृतिक प्रदूषण ही कहा जाएगा। इनके उत्थान के लिए जल्द ही एकांकी प्रयास शुरू करेंगे। क्योंकि भले ही वे किसी तबके या वर्ग के हों लेकिन हैं तो हमारे समाज के बुजुर्ग। इन्हें सहेजकर रखना हर नागरिक का कर्तव्य है।
डॉ. शैलेंद्र कबीर, समाजसेवी व संस्थापक जनकल्याण समिति
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