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चुनाव आते ही कच्ची दारू का जोर

Badaun

Updated Fri, 15 Jun 2012 12:00 PM IST
अभिषेक सक्सेना
बदायूं। कच्ची दारू बेचने वाले धंधेबाजों को प्रधानी से लेकर विधानसभा और संसदीय चुनाव तक का इंतजार रहता है। निकाय चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही जहां आबकारी विभाग भट्ठियों की खोज में लग गया, वहीं इस धंधे में शामिल लोग सुरक्षित इलाकों में सैकड़ों लीटर कच्ची दारू उतारने लगे हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो बड़े-बड़े ड्रमों में ट्रैक्टरों और जुगाड़ वाहनों में लादकर रात के अंधेरे में निश्चित ठिकानों पर पहुंच रहे हैं। इसमें आबकारी और पुलिस के कुछ लोग भी मददगार साबित हो रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए पुलिस अधीक्षक मंजिल सैनी ने सख्ती बरतनी शुरू कर दी है। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि कच्ची दारू केधंधेबाजों को पकड़ने के लिए बनी टीम के साथ ठेकेदारों के लोग नहीं शामिल होंगे। यदि ऐसा हुआ तो संबंधित लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।
जिले में जहां धधक रहीं भट्ठियां
पुलिस के आला अफसर के पास जो सूची उपलब्ध हुई है उसके तहत जिले में कादरचौक के गांव धनुपुरा, रेबा, लखूपुरा, भकोरा, कुड़ा शाहपुर, सकरी जंगल के अलावा कोतवाली दातागंज क्षेत्र केगांव पापड़, कोली, गड़ा, सिरसा, बोहरा, पराई, फिरोजपुर आदि में भट्ठियां शाम होते ही धधकने लगती हैं। भोर तक कच्ची दारू ड्रमों और केन में भर दी जाती है। सप्लाई से बची दारू केन सहित रेती वाले गड्ढे में दफन कर दी जाती है। उसके ऊपर ऐसा निशान बनाया जाता है जिससे यह धंधेबाज तुरंत निकाल लेते हैं। दारू बनाने के लिए गांव के बाहर तालाब, नदी किनारे, सरपत के झुरमुट अथवा झाड़ियों को ठीहा बनाया जाता है। हालांकि गांव वाले जानते हैं गश्ती पुलिस को भी पता होता है। वह उसी केअनुसार हफ्ता वसूलकर आंख बंद किए रहते हैं।
महिलाएं भी शामिल
कच्ची दारू के इस धंधे में महिला सदस्य काफी कारगर साबित होती हैं। यह उपाय खुद सरपरस्ती देने वाली पुलिस के ही लोग बताते हैं। जब छापेमारी की बात आती है तो धंधेबाजों को आधे घंटे पहले सूचना मिल जाती है। सरकारी तौर पर दिखाने के लिए कुछ बर्तन और भट्ठी छोड़ दी जाती है। सही तालमेल रहा तो कुछ लीटर के साथ दो-एक सदस्य गिरफ्तारी भी दे देते हैं।
चुनाव में इसे घर-घर बांटते हैं लोग
कच्ची दारू के जरिए चुनावी समर में वोटों के जरिए जीत हासिल करने वाले पहले ही रेकी करके हर घर केदारूबाजों की सूची बना लेते हैं। इसके बाद उन्हें बता दिया जाता है कि खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं है, बस अपने आसपास के वोटरों पर नजर रखिए। कच्ची दारू का वितरण भी गांव के भीतर नहीं बल्कि बाहरी इलाके में किया जाता है। कई लीटर पाने वाला व्यक्ति खुद लोटपोट होने के बाद अन्य लोगों को संगत में ले लेता है। यह काम भी रात के अंधेरे में ही शुरू हो चुका है।

चुनाव के दौरान जिले से बाहर की भी सप्लाई आती है। हमारी कम संख्या होने के बावजूद जहां सीमाओं पर निगरानी की जाती है। वहीं विभिन्न स्थानों पर धधकने वाली भट्ठियों की भी सरगर्मी से तलाश शुरू कर दी गई है। चूंकि धरपकड़ अभियान के लिए हर बार पुलिस बल नहीं मिल पाता है लिहाजा खुद ही कोशिश है कि न कच्ची दारू बने और न ही बाहर से तस्करी की शराब आए।
एके राय, जिला आबकारी अधिकारी
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